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छाया मत छूना मन..

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 एक दिन हिमांशु जोशी की 'छाया मत छूना मन' पढ़ते हुए कथावस्तु के लिखे जाने के समय-संदर्भ को  बेतहर समझने के लिए हम उसका प्रकाशन वर्ष ढूंढने लगे। उपन्यास की जो प्रति मेरे पास है उसमें प्रकाशन वर्ष दर्ज़ नहीं है। महज चौदहवाँ संस्करण , 2020 लिखा है। इसे भारतीय ज्ञान पीठ ने प्रकाशित किया है।  इंटरनेट पर भी खोजने की कोशिश की। तलाश की इस प्रक्रिया में प्रकाशन वर्ष तो नहीं दिखा लेकिन ये संस्मरण मिल गया जिसे विजय अग्रवाल जी ने लिखा है। पढ़ा जाए.. ★★★ यह सन् 1977 के दिनों की बात है, जब मैं हिन्दी साहित्य में एम.ए. कर रहा था. मुझे लगभग हर महीने अपनी दुकान की खरीदी के लिए कलकत्ता (कोलकाता) जाना पड़ता था. इस बार जब मैं जा रहा था, तो मेरे साथ पढ़ने वाली एक लड़की ने, जो बहुत ही साहित्य प्रेमी थी, मुझसे कलकत्ता से एक किताब लाने को कहा और वह भी उसकी चौदह प्रतियां. मैं चौंक गया. सच पूछिए तो तब तक मेरे साहित्य का ज्ञान स्कूली किताबों से इंच भर भी न तो आगे था और न ही ऊपर. चूंकि अनुरोध एक लड़की का था, जो उस जमाने में बहुत बड़ी बात हुआ करती थी, और उसके इस 'आदेशनुमा अनुरोध' ने मुझे देखते ही देखते कॉल...

नौला:प्राकृतिक जल स्रोत

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 ♦️ उत्तराखंड के परंपरागत जल स्रोत ◆ डॉ. नीलिमा पांडेय, प्रोफेसर, लखनऊ विश्वविद्यालय उत्तराखंड में पेयजल हासिल करने के लिए नौलो-धारो की परंपरा रही है। हिमालयी क्षेत्र में गांवों की बसावट का सर्वेक्ष ण किया जाए तो इस बात की जानकारी मिलती है कि गांव बनने की प्रक्रिया में आवासीय भवन पहले-पहल इन्हीं जल स्रोतों के आसपास विकसित हुए। उत्तराखंड में स्थानीय लोग इन्हें मंगरा, नौला या धारा कहते हैं। पूरे हिमालय क्षेत्र में इनकी संख्या पांच लाख के आसपास अनुमानित है। इतिहासकार ये मानते हैं कि उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में ज्यादातर नौले मध्यकाल में बने। ♦️नौला, चुपटौल, मंगरा अथवा धारा ◆ उत्तराखंड में परंपरागत जल स्रोत नौला कहलाता है। नौला ऐसे स्रोत पर बना होता है, जहां पानी जमीन से रिस-रिस कर पहुंचता है। अपनी संरचना में नौला कुछ-कुछ बावड़ी की तरह ही होता है। यह आमतौर पर तीन तरफ से पत्थरों की दीवार से घेर दिया जाता है। ऊपर से स्लेट की छत डाल दी जाती है। भीतर जिस जगह जल एकत्रित होता है उसका आकार वर्गाकार पिरामिडिकल होता है, जो ऊपर की ओर चौड़ा रहता है तथा नीचे की ओर क्रमशः धीरे-धीरे संकरा होता जा...

तीजनबाई और पण्डवानी

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♦️तीजनबाई और पंडवानी: छत्तीसगढ़ की लोक कला की अमर आवाज भारतीय लोक संस्कृति की धरोहरों में पंडवानी एक अनुपम कला है। यह महाभारत की कथाओं को संगीत, गायन और नाटकीय अभिनय के माध्यम से जीवंत करने वाली छत्तीसगढ़ की पारंपरिक लोक कला है। इस कला को विश्व पटल पर पहचान दिलाने वाली महान कलाकार डॉ. तीजनबाई (8 अगस्त 1956 – 5 जुलाई 2026) का नाम सदैव स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा। तीजनबाई  न केवल पंडवानी को पुरुष-प्रधान क्षेत्र से निकालकर महिलाओं की पहुंच में लाईं, बल्कि इसे गांव की चौपाल से लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाया। पद्म विभूषण प्राप्त उनकी यह यात्रा संघर्ष, समर्पण और सांस्कृतिक संरक्षण की मिसाल है। ♦️पंडवानी कला  पंडवानी शब्द “पांडव + वाणी” से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है पांडवों की कहानी। यह छत्तीसगढ़ और आसपास के क्षेत्रों (मध्य प्रदेश, ओडिशा आदि) में प्रचलित लोक कथा-गायन की एक विशिष्ट शैली है। इसमें महाभारत के प्रसंगों को मुख्य रूप से भीम को केंद्र में रखकर गाया और अभिनीत किया जाता है। ♦️मुख्य विशेषताएं ◆ एकल प्रस्तुति: मुख्य कलाकार अकेले ही गाता, बोलता और कई पात्रों का अभिनय क...

वैदिक कारीगर

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वाजसनेयी संहिता में कुम्भकार के अतिरिक्त अन्य अठारह प्रकार के कारीगरों का उल्लेख 'वाजसनेयी संहिता' (अध्याय-30) में है जो निश्चय ही कारीगरी की कुशलता के प्रमाण हैं। ये पेशे हैं. 1. कर्मार (लोहार) 2. मणिकार (आभूषण-निर्माता) 3. इषुकार (बाण बनाने वाले) 4. धनुकार (धनुष बनाने वाले) 5. ज्याकार (धनुष की डोरी के निर्माता) 6. रज्जुसर्ज (रस्सी तैयार करने वाले) 7. सुराकार (मदिरा बनाने वाले) 8. वासः पल्पूली (धोबी, रजक) 9. रजयित्री (कपड़े रंगने वाले, शायद इसे स्त्रियाँ करती थीं) 10. चर्मम्न (चर्मकार) 11. हिरण्यकार (स्वर्णकार) 12. धीवर (मल्लाह) 13. हस्तिप (हाथी की देखभाल करने वाला, पीलवान) 14. अश्वप (घुड़साल की देखभाल करने वाला) 15. गोपालक (गोरक्षक) 16. सूत (अभिनय करने वाला) 17. शैलूष (गायक) 18. मृगायुमन्तक (व्याघ या शिकारी)। वाजसनेयी संहिता एवं तैत्तिरीय ब्राह्मण में भिषक् या चिकित्सक की वृत्ति भो उल्लिखित है। इस प्रसंग में कहना उचित है कि अथर्ववेद के तथाकथित 'पौष्टिकानि सूक्तानि' में अनेक प्रकार के रोगों तथा उनके शमन का प्रसंग विवेचित है। लगता है समाज में चिकित्सक का पेशा क्रमशः विक...

करेला :02 ☘️☘️

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 करेला🥀 : 02 - 🎈करेले से जुड़ी कहावतें ▪️करेले से जुड़ी एक कहावत है, 'एक तो करेला, दूसरा नीम चढ़ा'। इसका मतलब है कि पहले से ही दोष होने पर दूसरा दोष भी आ मिलना। इस कहावत का इस्तेमाल किसी ऐसे व्यक्ति के लिए किया जाता है, जो किसी काम के लिए अच्छा न हो, लेकिन उसमें अकड़ ज़्यादा हो। ▪️चैते गुड़, बैशाखे तेल, जेठ महुआ, आषाढ़े बेर। सावन दुदुआ, भादो दही, क्वांर करेला, कार्तिक माही, घाघ भड्डरी सांची कही मर है ना तो पर है सही। चैत में गुड़, बैशाख में तेल, जेठ में महुआ तथा आषाढ़ में बेर खाने वाला, सावन में दूध पीने वाला, भादो में दही, क्वांर में करेला एवं कार्तिक में मट्ठा खाने वाला शीघ्र मर जाता है। यदि मरे नहीं तो भयंकर बीमार पड़ जाता है।  लोक कहावतों में इस बात का भी वर्णन किया गया है कि हमें किस मौसम में किस प्रकार का भोजन करना चाहिए और किस प्रकार का भोजन नहीं करना चाहिए। यह भी उल्लेख है कि किस मौसम में कितनी बार भोजन करना चाहिए, जिससे हमारा शरीर स्वस्थ और निरोग बना रहे। ▪️सावन मास करेला फूला, नानी देख नवासा भूला। पक्षधर के भरोसे पर प्रबलता दिखाने वाले के संबंध में कहते हैं। नानी नव...

करेला : 01 ☘️☘️

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 ☘️ करेला एक प्रकार का सब्जी है जो कि कुकुरबिटेसी परिवार से संबंधित है, और इसका वैज्ञानिक नाम मोमोर्डिका चैरेंटिया है। ☘️ करेला अफ्रीका मूल की वनस्पति है। प्रमाणिक स्रोतों के अनुसार इसे अफ्रीका में आज से 3000 वर्ष पूर्व उगाया जाता था। वही से यह भारत, चीन और अन्य एशियाई देशों में पहुँचा। जहां इसका उपयोग विभिन्न प्रकार के व्यंजनों में किया जाने लगा। ☘️ भारत में करेले का उपयोग आयुर्वेदिक दवाओं में भी किया जाता है। करेले में विटामिन, खनिज, और एंटीऑक्सीडेंट होते हैं, जो कि शरीर को स्वस्थ रखने में मदद करते हैं। ☘️ भारत में करेले का आगमन लगभग 1500 वर्ष पूर्व हुआ था, जब यह अफ्रीका से भारतीय उपमहाद्वीप में आया था। उस समय, भारत में व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के कारण विभिन्न प्रकार के पौधे और सब्जियां आयात की जाती थीं। ☘️ करेला सबसे पहले भारत के दक्षिणी भाग में आया, जहां इसका उपयोग स्थानीय व्यंजनों में किया जाने लगा। धीरे-धीरे, इसका उपयोग पूरे भारत में फैल गया, और यह एक लोकप्रिय सब्जी बन गई। ☘️ अलग-अलग क्षेत्रों में करेले के नाम भिन्न होते हैं। भारत में करेले को विभिन्न नामों से जाना ज...

शिमला मिर्च:02 ❣️

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 🥀शिमला मिर्च को बेल पेपर्स के नाम से भी जाना जाता है।  यह एक प्रकार का सब्जी है जो कि कैप्सिकम प्रजाति का हिस्सा है। 🥀शिमला मिर्च की उत्पत्ति मध्य और दक्षिण अमेरिका में हुई थी, जहाँ यह 6,000 वर्ष पूर्व से उगाया जाता था। 🥀 कोलंबस के समय में  इसे यूरोप में लाया गया था, जहाँ इसे एक सजावटी पौधे के रूप में उगाया जाता था। 🥀17वीं शताब्दी में  शिमला मिर्च को एक खाद्य पदार्थ के रूप में स्वीकार किया गया और इसका उपयोग विभिन्न व्यंजनों में किया जाने लगा।  🥀आजकल, शिमला मिर्च दुनिया भर में उगाया जाता है और इसका उपयोग विभिन्न प्रकार के व्यंजनों में किया जाता है। 🥀शिमला मिर्च की तमाम किस्में हैं, जिनमें से कुछ प्रमुख किस्में हैं :  हरी शिमला मिर्च, लाल शिमला मिर्च, पीली शिमला मिर्च और नारंगी शिमला मिर्च। 🥀चाहे शिमला मिर्च किसी भी रंग की हो पर उसमें विटामिन सी, विटामिन ए और बीटा कैरोटीन भरा होता है।  🥀इसके अंदर थोड़ी सी भी कैलोरी नहीं होती इसलिये यह कोलेस्‍ट्रॉल को नहीं बढ़ाती। साथ ही यह वजन को स्थिर बनाये रखने के लिये भी कारगर  है। 🥀 हाट-मण्डी में शिमला...