छाया मत छूना मन..
एक दिन हिमांशु जोशी की 'छाया मत छूना मन' पढ़ते हुए कथावस्तु के लिखे जाने के समय-संदर्भ को बेतहर समझने के लिए हम उसका प्रकाशन वर्ष ढूंढने लगे। उपन्यास की जो प्रति मेरे पास है उसमें प्रकाशन वर्ष दर्ज़ नहीं है। महज चौदहवाँ संस्करण , 2020 लिखा है। इसे भारतीय ज्ञान पीठ ने प्रकाशित किया है। इंटरनेट पर भी खोजने की कोशिश की। तलाश की इस प्रक्रिया में प्रकाशन वर्ष तो नहीं दिखा लेकिन ये संस्मरण मिल गया जिसे विजय अग्रवाल जी ने लिखा है। पढ़ा जाए.. ★★★ यह सन् 1977 के दिनों की बात है, जब मैं हिन्दी साहित्य में एम.ए. कर रहा था. मुझे लगभग हर महीने अपनी दुकान की खरीदी के लिए कलकत्ता (कोलकाता) जाना पड़ता था. इस बार जब मैं जा रहा था, तो मेरे साथ पढ़ने वाली एक लड़की ने, जो बहुत ही साहित्य प्रेमी थी, मुझसे कलकत्ता से एक किताब लाने को कहा और वह भी उसकी चौदह प्रतियां. मैं चौंक गया. सच पूछिए तो तब तक मेरे साहित्य का ज्ञान स्कूली किताबों से इंच भर भी न तो आगे था और न ही ऊपर. चूंकि अनुरोध एक लड़की का था, जो उस जमाने में बहुत बड़ी बात हुआ करती थी, और उसके इस 'आदेशनुमा अनुरोध' ने मुझे देखते ही देखते कॉल...