वैदिक कारीगर
वाजसनेयी संहिता में
कुम्भकार के अतिरिक्त अन्य अठारह प्रकार के कारीगरों का उल्लेख 'वाजसनेयी संहिता' (अध्याय-30) में है जो निश्चय ही कारीगरी की कुशलता के प्रमाण हैं। ये पेशे हैं.
1. कर्मार (लोहार)
2. मणिकार (आभूषण-निर्माता)
3. इषुकार (बाण बनाने वाले)
4. धनुकार (धनुष बनाने वाले)
5. ज्याकार (धनुष की डोरी के निर्माता)
6. रज्जुसर्ज (रस्सी तैयार करने वाले)
7. सुराकार (मदिरा बनाने वाले)
8. वासः पल्पूली (धोबी, रजक)
9. रजयित्री (कपड़े रंगने वाले, शायद इसे स्त्रियाँ करती थीं)
10. चर्मम्न (चर्मकार)
11. हिरण्यकार (स्वर्णकार)
12. धीवर (मल्लाह)
13. हस्तिप (हाथी की देखभाल करने वाला, पीलवान)
14. अश्वप (घुड़साल की देखभाल करने वाला)
15. गोपालक (गोरक्षक)
16. सूत (अभिनय करने वाला)
17. शैलूष (गायक)
18. मृगायुमन्तक (व्याघ या शिकारी)।
वाजसनेयी संहिता एवं तैत्तिरीय ब्राह्मण में भिषक् या चिकित्सक की वृत्ति भो उल्लिखित है। इस प्रसंग में कहना उचित है कि अथर्ववेद के तथाकथित 'पौष्टिकानि सूक्तानि' में अनेक प्रकार के रोगों तथा उनके शमन का प्रसंग विवेचित है। लगता है समाज में चिकित्सक का पेशा क्रमशः विकसित हुआ। ऋग्वेद की तुलना में, उत्तर वैदिक साहित्य में केवल कारीगरों और पेशेवरों की विविधता और संख्या ही नहीं बढ़ी; विशेष दक्षता संपन्न कारीगरों की उपस्थिति भी दिखाई पड़ती है। विशेष रूप से तीर, धनुष और धनुष की डोरी तैयार करने के लिए तीन पृथक् कारीगर हो गए।
ऋग्वेद की तुलना में उत्तर वैदिक साहित्य में बिक्री की वस्तुओं के विनिमय से संबद्ध तथ्य कुछ अधिक मिलते हैं। यजुर्वेद में 'वणिज' शब्द की व्याख्या वणिक्-पुत्र के रूप में की गई है। वणिक् की वृत्ति वंशानुक्रम में होने का यह प्रथम साक्ष्य है। इस काल में 'श्रेष्ठी' शब्द का पहली बार प्रयोग हुआ। यह श्रेष्ठी सर्वाधिक धनी वणिक का बोधक था। शतपथ ब्राह्मण और तैत्तिरीय संहिता में 'कुसीद' (ऋण) और 'कुसीदिन' (सूदखोर व्यवसायी) का उल्लेख है।

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