स्वर्णकुमारी घोषाल : 🥀🌼
🥀 स्वर्णकुमारी घोषाल :
स्वर्णकुमारी की पहचान एक कवयित्री, उपन्यासकार और सामाजिक कार्यकर्ता की है। उनका जन्म स्थान बंगाल था।
उनके परिचय की कड़ी में भारती पत्रिका एक महत्वपूर्ण प्रस्थान बिन्दु है।
लगातार 30 वर्षों तक वह इस प्रसिद्ध साहित्यिक-मासिक से जुड़ी रहीं।उन्होंने इसमें की लेखिका और संपादक की भूमिका भी निभाई। साहित्य सृजन, लेखन और सम्पादन के अतिरिक्त उन्होंने हाशिये पर पड़े लोगों ख़ासकर स्त्रियों, अनाथों और विधवाओं के उत्थान की दिशा में महत्वपूर्ण काम किया। वह राजनीतिक रूप से भी सक्रिय थीं।
सन 1889 और सन 1890 में पंडिता रमाबाई, रमाबाई रानाडे और कादम्बिनी गांगुली के साथ उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के वार्षिक सत्र में भाग लिया। वह सत्र के लिए चुने गए बंगाल प्रतिनिधिमंडल के पहले दो सदस्यों में से एक थीं।
उनकी अन्य उपलब्धियों में कलकत्ता विश्वविद्यालय का जगत्तारिणी स्वर्ण पदक प्राप्त करना है। पदक पाने वाली वह बंगाल की पहली लेखिका थीं। उन्होंने सन 1929 में वांगीय साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष की भूमिका निभाई।
बंगाल के अभिजात्य परिवार में जन्मी स्वर्णकुमारी का विवाह सन 1868 में जानकीनाथ घोषाल से हुआ। वह एक जमींदार परिवार के सुशिक्षित व्यक्ति थे और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सचिव थे। विवाह के वक़्त वह 12 वर्ष की अल्पायु बालिका थीं। उनके पिता महर्षि देवेन्द्रनाथ टैगोर का परिवार बंगाल का चर्चित कुलीन परिवार था।
उनके 27 वर्षीय पति आयु में उनसे बड़े, वयस्क और समझदार थे। उन्होंने अपनी पत्नी की योग्यता और साहित्यिक-सामाजिक रुझान को पहचान उनके व्यक्तित्व के विकास में भरपूर सहयोग किया।
चूंकि स्वर्णकुमारी एक अभिजात्य परिवार से सम्बंध रखती थीं इसलिए स्त्री जीवन से जुड़ी तमाम दुविधाओं के बावजूद उनको एक बेहतर परिवेश और अनेक सुविधाएं हासिल थीं। इसलिए उनकी व्यक्तिगत सोच और वैचारिकी को समझने का बेहतर ज़रिया उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि की तुलना में उनका साहित्य-कर्म है।
आलोचकों की राय में उनके नायक हमेशा एक आक्रामक पहचान रखते थे जो तत्कालीन समाज की नैतिक और पितृसत्तात्मक विचारधारा के अनुरूप नहीं था। उनकी कहानियों में स्त्रियों की दैन्य-दिनी समाजिकता, भावुकता, व्यक्तिगत सम्बन्धों का भावनात्मक आवेग, प्रेम को सर्वस्व और अपना पूर्ण अस्तित्व स्वीकारने की कमजोरी आदि चित्रित हैं। उनके साहित्यिक चरित्र उनकी मानसिक बुनावट और दृष्टि को समझने में हमारी मदद करते हैं।
साहित्यिक सक्रियता के दृष्टिगत क्रमिक रूप से उनकी रचनाओं में निरंतर निखार और परिष्कार देखा जा सकता है। सन 1879 में उन्होंने कई सामाजिक उपन्यास लिखे। इनमें काहाके अपनी विषय-वस्तु के दृष्टिकोण से अलग था।
काहाके का अँग्रेज़ी रूपान्तरण 'एन अनफिनिश्ड सॉन्ग' के रूप में किया गया। अंग्रेजी में अनूदित यह उनका पहला उपन्यास था। इसके माध्यम से न सिर्फ़ उनका पाठक वर्ग बढ़ा बल्कि उनके विचारों को विस्तार भी मिला।
काहाके मृणालिनी और मोनी या मिस मजूमदार की कहानी है जो विशिष्ट कुलीन उच्च जाति के हिन्दू बांग्ला परिवार से वास्ता रखती हैं। इसका अधिकांश परिवेश फैशनेबल, अंग्रेज़ियत से भरी बंगाल की तात्कालिक सामाजिक स्थिति को दर्शाता है। इसका कथानक विवाह से पूर्व होने वाले एक रूमानी प्रेम की इच्छा के साथ समाप्त होता है। कथानक की सुन्दरता और गरिमा इस उपन्यास को अद्भुत बनाती है। उनके इस महिला प्रधान उपन्यास ने तत्कालीन प्रबुद्ध समाज में तहलका मचा दिया था।
28 अगस्त सन 1856 को जन्मीं स्वर्णकुमारी की मृत्यु रविवार 3 जुलाई 1932 को हुई। उनके जीवन की महत्वपूर्ण गतिविधियां सन 1870 से सन 1932 के बीच घटीं। समय के परिपेक्ष्य में देखने पर हम उनको अपने वक़्त से काफी आगे पाते हैं।
उनकी मृत्यु पर अमृत बाजार पत्रिका ने लिखा :
'बंगाल की अपने समय की सबसे विलक्षण महिला जिसने वहाँ की स्त्री जाति के उत्थान के लिए वह सब किया जो उससे बन पड़ा। साहित्य की साम्राज्ञी स्वर्णकुमारी का गंतव्य अब स्वर्ग है। सबसे चमकदार व्यक्तित्व की महिला जिसने साहित्य को नई ऊँचाइयों पर पहुँचाया, अब नहीं रही।'
औपनिवेशिक भारत की इस जागरूक विदुषी स्त्री की महत्वपूर्ण जीवनी हाल ही में पेंगुइन स्वदेश से प्रकाशित हुई है। लेखक राजगोपाल सिंह वर्मा हैं। इसके पूर्व भी उनकी ऎतिहासिक पृष्ठभूमि पर लिखी गई कृतियां प्रकाशित हुई हैं। स्वर्णकुमारी की यह जीवनी औपनिवेशिक इतिहास और स्त्री-अध्ययन के विद्यार्थियों-शोधार्थियों के लिए महत्वपूर्ण है। इसे लिखने और स्वर्णकुमारी से पाठकों को परिचित करवाने के लिए लेखक को साधुवाद। यदि आप स्वर्णकुमारी को समग्र रूप से जानने को उत्सुक हैं तो पेंगुइन से प्रकाशित इस जीवनी को ज़रूर पढ़ें।
-नीलिमा पांडेय
प्रोफेसर, लखनऊ विश्वविद्यालय, उत्तर प्रदेश, भारत

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