हिमांशु जोशी की "यात्रायें" पढ़ते हुए

 कहानियों उपन्यासों की तरह हिमांशु जोशी के यात्रा वृतांतों  की भी अपनी विशेषता है। पढ़ते-पढ़ते पाठक को लगने लगता है कि इन यात्राओं में लेखक के साथ-साथ वह भी यात्रा कर रहा है। लेखक जिस तरह से इन सब को देख रहा है, जिस तरह की अनुभूतियों उसे हो रही है , कुछ कुछ वैसी ही पाठक को भी होने लगती है । सरलत , सहजता, स्वभाविकता हिमांशु जोशी की रचनाओं के सहज स्वाभाविक गुण हैं। यही मूल गुण किसी रचना को जीवंत बनाने में सफल होते हैं। 


इन यात्राओं में कश्मीर के बर्फीले दुर्गम सीमा क्षेत्र शामिल हैं तो पूर्व में बांग्लादेश और भारत को विभाजित करने वाली सुदूर हरित वंगा या इच्छामति के कूल-कगार भी। कहीं कन्याकुमारी तथा केरल के मनोरम हरित दृश्यावलियां हैं तो कुमाऊं के पर्वतीय प्रदेश के अनेक-अज्ञात अछूती मनोरम झांकियां भी। मॉरीशस का नील वर्णी निर्मल स्वच्छ सागर है तो कहीं उत्तरी हिम प्रदेश की शीतल सफेद हवाएं भी अपने अस्तित्व का एहसास जताने लगती हैं।


 हिमांशु जोशी हिंदी के पहले लेखक हैं जिन्होंने विश्व विख्यात नाटककार हेनरिक इब्सन के घर  सींयन की साहित्यिक यात्रा की थी। उसी तरह  नोबेल पुरस्कार से सम्मानित नार्वेजियन लेखक सीगरी उनसत तथा ब्यौनर्सन के घरों की तीर्थ यात्राएँ भी। 


ये विवरण मात्र यात्रा-विवरण ही नहीं हैं ,बल्कि इनमें इतिहास भी है, भूगोल भी और साथ-साथ साहित्य भी। कला एवं संस्कृति की मार्मिक छुअन इनकी विशिष्टता है। इसलिए ये वृतांत दस्तावेज़ सरीखे हैं - जिए हुए अतीत का एक ऐसा टुकड़ा जो काग़ज़ पर धड़क रहा है। पाठक को पढ़ते हुए   संपूर्ण जीवन का अहसास होने लगता है। एक साथ वह बहुत कुछ ग्रहण  करने में सफल होता है।  यही इन वृतांतों की बड़ी सफलता है ।


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▪️ हिमांशु जोशी की "यात्रायें" पढ़ते हुए


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