गली क़ासिम जान' से गुज़रते हुए ____________
'गली क़ासिम जान' से गुज़रते हुए
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'गालिब की जिंदगी दुख की एक दास्तान थी पर मन उनका सृजनात्मकता से ओतप्रोत था । और ज़माना ? वह इतना तेज बदल रहा था कि उसके साथ चल पाना मुनासिब न था। हिंदुस्तान बरतानिया के शिकंजे में कुछ और हो गया था।
गालिब का अनुभूति प्रवण मन यह समझ गया था कि डेढ़ सौ सालों से ढहते-ढहते मुगल साम्राज्य अंततः ढह ही गया है। एक तहजीब ख़त्म हो गई है । वे विगत और भविष्य के संधि- स्थल पर खड़े एक ऐसे दृष्टा थे , जिसे अपने दुखों के सिरे में बंधा समूचा एक वक़्त , एक पूरा एक मुल्क दिखता था।
अपनी रगों में बहते उदासी के इसी आलम को , दिल में ठहर गई इसी गहन पीड़ा को उन्होंने शेरों सुखन में तब्दील किया। उनकी शायरी उनके अंतर्मन की बड़ी ही तवील कहानी है। और ग़ालिब जिंदगी ? उसकी एक मुख़्तसर सी कहानी इस ज़िंदगीनामा में है - आँख से लहू टपकाती !'

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