बेहयाई के बहत्तर दिन :🥀❣️

 लेखक घूमने के साथ-साथ 'घुमाने' का शौक भी रखते हैं। "बेहयाई.." को पहली बार हाथ में थाम नज़र फिरायेंगे तो वाक़ई आप घूम जाएंगे। 


वैसे ऐसा हो ये ज़रूरी भी नहीं है। ये भी हो सकता है कि आपके घूमने की शिद्दत लेखक के शौक़ पर भारी पड़ जाए। फिर आज़मा कर देखिये। 


लेकिन जरा ठहरिए। आज़माने से पहले एक दफ़ा उलट-पलट जरूर देख लें। मेरे हिसाब से तो रास्ता और मंज़िल दोनों दुरुस्त हैं। बस चक्कर थोड़े अधिक हैं, ठीक अपने पहाड़ी रास्तों के मार्फ़त। 


इसलिए 72 दिनी इस परिक्रमा से रूबरू होते हुए ज्यादा न सही 27 चक्कर तो आप के हिस्से आने ही हैं। इन्हीं चक्करों में उस तिलिस्म की चाबी है जिसे यायावरी कहते हैं.. 


तिलिस्म के भीतर जाकर ही चौचक ज्ञान मिलता है कि इधर आपने मुश्किलात को आसानियों का जामा पहनाया उधर आपके बयान में क़िस्सा-गो सी लज़्ज़त कायम हुई। क़िस्से में दिलचस्प रवानी न हो तो क्यूँ कोई सुनेगा आप की बात? 


इस एक सबक़ के लिए भी इस 'पुरबिया संगीत' से रूबरू हुआ जा सकता है। हर मोर्चे में खरा न भी हो तो भी मन के पंछी की परवाज़ को कुछ और सफ़ेदी देने के वास्ते ही पढ़ जाइये..

▪️नीलिमा पांडेय

प्रोफेसर, लखनऊ विश्वविद्यालय, उत्तरप्रदेश, भारत।

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