अम्बपाली:एक उत्तरगाथा पढ़ते हुए

 अम्बपाली का जन्म वैशाली (बिहार) में हुआ। एक आम के पेड़ के नीचे जन्म लेने के कारण उसका नाम अम्ब पाली रखा गया। देखने में वह विलक्षण सुंदरी थी।


 युवावस्था को प्राप्त करते ही उसका सौंदर्य चर्चा का विषय बना। इसी वजह से वैशाली के राजकुमारों में उसके साथ विवाह करने की परस्पर  स्पर्धा थी। इस कलह को शांत करने के लिए पंचायत ने यह निर्णय दिया कि वह गणिका का व्यवसाय कर राज्य की सेवा करे। 


कालांतर में बौद्ध धर्म के प्रति आकर्षित होकर अम्बपाली ने अपने उपवन में एक बाग बनवाकर बुद्ध और संघ को दान में दिया।  


विमल कौण्डिन्य नाम के उसके एक पुत्र का उल्लेख मिलता है। जिसने मिक्षु संघ में प्रवेश लिया था। जीवन के अंतिम दिनों में उसी के प्रभाव में अम्बपाली ने भी प्रव्रज्या ग्रहण की।  बौद्ध साहित्य में उल्लेख मिलता है की पुत्र विमल कौण्डिन्य  ने ही उपदेश देकर अपनी माँ को प्रव्रज्या ग्रहण करवाई।विमल कौण्डिन्य के पिता मगध नरेश विम्बिसार थे।


 जीवन पर्यंत अम्बपाली ने एक गणिका की तरह  जीविकोपार्जन किया जो शारीरिक सौंदर्य पर केंद्रित पेशा है। उम्र ढलने पर जरावस्था के प्रभाव में शारीरिक सौंदर्य किस तरह प्रभावित होता है, शरीर में आने वाले उन विभिन्न परिवर्तनों को केंद्र में रखकर उसने अपनी गाथा की रचना की। दैहिक सौंदर्य उसके अधिकांश जीवन के केंद्र में रहा। उसका न होना जीवन में एक टीस के तरह उभरता है।


 मुक्ति के मार्ग पर यह सीख मिलती है कि समस्त सांसारिक वस्तुओं की अनित्यता के समान ही शरीर का सौंदर्य भी अनित्य एवं नश्वर है। अम्बपाली की गाथा का मर्म यही है। थेरी गाथा में संग्रहित अम्बपाली की गाथा उसके ऐतिहासिक होने का प्रमाण है।


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अम्बपाली और विम्बिसार के प्रेम की कोई आहट बौद्ध साहित्य से नहीं मिलती है। ये किस्सा फोकलोर का हिस्सा जरूर है। उसका गणिका होना उनके प्रेम के आड़े आ गया। ऐसा नहीं है कि बौद्ध साहित्य उनकी चर्चा नहीं करता। चर्चा है पर उस चर्चा का केंद्र थेरी अम्बा है , गणिका अम्बपाली नहीं।


बौद्ध साहित्य के अनुसार गौतम बुद्ध राजगृह जाते या लौटते समय वैशाली में रुकते थे, जहाँ एक बार उन्होंने अम्बपाली का भी आतिथ्य ग्रहण किया था। बौद्ध ग्रंथों में बुद्ध के जीवनचरित पर प्रकाश डालने वाली घटनाओं का जो वर्णन मिलता है उन्हीं में से अम्बपाली के संबंध की एक प्रसिद्ध और रूचिकर घटना है।


 कहते हैं, जब तथागत एक बार वैशाली में ठहरे थे तब जहाँ उन्होंने देवताओं की तरह दीप्यमान लिच्छवि राजपुत्रों की भोजन के लिए प्रार्थना अस्वीकार कर दी, वहीं उन्होंने गणिका अंबपाली की निष्ठा से प्रसन्न होकर उसका आतिथ्य स्वीकार किया।


 इससे गर्विणी अम्बपाली ने उन राजपुत्रों को लज्जित करते हुए अपने रथ को उनके रथ के बराबर हाँका। उसने संघ को आमों का अपना बगीचा भी दान कर दिया था जिससे वह अपना चौमासा (वर्षा वास) वहाँ बिता सके।


बाद में बुद्ध के उपदेश से प्रभवित हो अम्बपाली ने बुद्ध और उनके संघ की अनन्य उपासिका हो गई थी और उसने सांसारिक जीवन से मुख मोड़कर अर्हत् का जीवन बिताना स्वीकार किया।


स्त्री जीवन में प्रेम अलभ्य और दुर्लभ दिखता है। इतिहास पढ़ते हुए यह कथन एक तथ्य की तरह स्थापित होता दिखता

 है।

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इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर 'अम्बपाली : एक उत्तरगाथा' उपन्यास केंद्रित है। ये महज इत्तेफ़ाक़ है कि मैंने थेरियों को सिर्फ़ इतिहास के दृष्टिकोण से पढ़ा-समझा है। उन पर लिखी गयी किसी साहित्यिक कृति से रूबरू नहीं हुई। कुछ बरस पहले थेरी गाथा का अनुवाद भी किया था। इसलिए यह उपन्यास मेरे लिए एक नए अनुभव संसार में दाखिल होने जैसा है। अम्बपाली के अलावा कुछ अन्य थेरियों का भी ज़िक्र है। बौद्ध संघ का परिवेश है। उम्मीद है इतिहास और साहित्य की यह जुगलबन्दी रोचक होगी। भाषा का सौंदर्य और उसकी रवानी दिख रही है..

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नीलिमा पांडेय

प्रोफेसर प्राचीन इतिहास एवं पुरातत्व विभाग

सह्युक्त महाविद्यालय, लखनऊ विश्वविद्यालय


(अम्बपाली:एक उत्तरगाथा पढ़ते हुए)

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