आलोचक और चेखोव 🥀🌼

 "आलोचक मक्खियों जैसे होते हैं जो घोड़े को हल नहीं चलाने देतीं, " चेखोव मुस्कुराते हुए कहते।


 " घोड़ा काम करता है,  उसकी एक-एक रग तनी होती है,  पर तभी पुट्ठे पर मक्खी आ बैठती है और उसे गुदगुदाने लगती है, भिनभिनाती है। खाल से उसे झटकना होता है, पूँछ हिलानी पड़ती है। और वह भिनभिनाती क्या है ?  उसे भी शायद ही पता हो। बस, स्वभाव ही ऐसा है और फिर यह दिखाना चाहती है कि देखो दुनिया में मैं भी हूं । भिनभिना भी सकती हूं ! पच्चीस बरस से मैं अपनी कहानियों की आलोचनाएं पढ़ रहा हूं। आज तक एक भी काम की बात, एक भी नेक परामर्श नहीं सुना। बस एक बार स्काबिचेव्स्की  की बात पढ़कर मैं प्रभावित हुआ था ,  उसने लिखा था कि मैं नशे में धुत होकर नाली में पड़ा मरूंगा ...."


--   मक्सिम गोर्की

(साभार : आशुतोष दुबे)


▪️तस्वीर: गोर्की , चेखव , उनकी बहन और भांजी


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