लीडिया एविलोव : मेरी ज़िंदगी में चेखव

 लीडिया एविलोव : मेरी ज़िंदगी में चेखव

अपनी बुनावट में अंतरंग और संवेदनशील कथा है।

क़िस्तों में मैंने इसे सालों पहले हंस में पढ़ा था। बाद में एकमुश्त छप कर आई तो खरीद ली। हंस में पढ़ते हुए किसी हिस्से की कोई बात बिल्कुल तिरछी धंस गई। उसके बाद कहीं भी कभी भी चेखव का ज़िक्र लीडिया की याद दिलाता साथ ही एक अनमना सा  ख़्याल उभरता 'प्यार भूलने की चीज नहीं'। इन पाँच लफ़्ज़ों को हर दिन किसी न किसी डूबते-उबरते पहर में याद ज़रूर किया है मैंने।

चेखव रूस से थे। रूस किसी न किसी भेस में अस्त-व्यस्त फैला-बिखरा रहता हमारे घर में। इस बिखराव में चेखव भी थे। और थीं उनकी किताबें। सजिल्द 'थ्री सिस्टर्स' तो न जाने कब तक मेरी मेज पर जगह घेरे रही। उनका साहित्यकार और डॉक्टर होना एक लीथल कॉम्बिनेशन था। अस्सी-नब्बे के दशक में हम साधारण मध्यवर्गीय परिवेश मे पलने बढ़ने वाले बच्चे  इंजीनियर -डॉक्टर बनने की जद्दोजहद करते हुए मनोरंजन और मानसिक खुराक़ के लिये साहित्य पर ही निर्भर थे। ऐसे में चेखव हमारी कल्पना में ध्रुव तारे की तरह चमकते थे।

ज़ाहिर है  मैंने लीडिया-चेखव की मोहब्बत को हुलस कर पढ़ा होगा। यूँ भी  कम उम्र में रंगों की चमक इंद्रधनुष में ही ढलती है। सफ़ेद-स्याह हिस्से पूरी तरह छूट जाते हैं। बहरहाल अब उलटने पलटने पर 'मेरी ज़िंदगी में चेखव' एक गहरी उदासी के वक़्फ़े की तरह गुज़रता है। 

जीवन को लेकर इस संस्मरण के आख़िर में चेखव के हवाले कुछ पंक्तियां दर्ज़ हैं :

'जीवन कहीं अधिक सहज है, इतनी यन्त्रणा भोगने के योग्य नहीं।' अपनी ज़िंदगी में यदा-कदा हम सब इस फ़लसफ़े से गुज़रते हैं। 

लीडिया को लिखे गए  अपने ख़त के अंत में चेखव   गुज़ारिश  करते हैं :

"सदा ख़ुश रहो और जीवन को बहुत गम्भीरता से न लो। शायद वह कहीं अधिक सहज है...और फिर जिस  जीवन से हम परिचित नहीं, क्या वह इस योग्य है कि उसके लिए इतनी यन्त्रणा भोगी जाए। मेरी राय में तो नहीं।"

पढ़ते हुए 14 फ़रवरी की तारीख़ पर मैं ठिठक जाती हूँ। ख़त लिखने की तारीख़।  होंठों पर एक मन्द मुस्कान उभरती है और वही  याद कि 'प्यार भूलने की चीज नहीं'।

* * *

लीडिया एविलोव चेखव से चार बरस छोटी थीं। उनका जन्म 1864 में मास्को में हुआ। चेखव से पहली मुलाक़ात के समय उनकी उम्र पच्चीस बरस की थी। उनकी किताब 'चेखव इन माई लाइफ़' चेखव की मृत्यु के कई साल बीत जाने पर प्रकाशित हुई। इस शीर्षक में चेखव के साथ उनकी आठ मुलाक़ातें (1889-1899) तफ़सील से दर्ज़ हैं।  

दस बरस में आठ बार मिलने वाले , कल्पना की उमंग में बहते दो प्रेमी , पूरे परिवेश से कटे , फ़न्तासी से सागर में गोते लगाते , अपनी शिशुवत बाल सुलभ जिज्ञासा से बार-बार अंतर्मन को भिगो देते हैं। इस संस्मरण में मोहब्बत से जुड़ी तमाम नसीहतें शामिल हैं और फ़लसफ़े भी।इसके कुछ वाक्यांश हैं जो ठहरने पर मजबूर करते हैं। 

• कुछ लोग आधुनिकता के सस्ते संस्करण दिखते हैं।(पृ.56)

• किसी का भला लगना और सुखी होना दोनों में अंतर है।(पृ.56)

• स्त्रियों की पराधीनता हमारे अतीत की विरासत है।(पृ. 56)

• अफ़वाह के लिए क्या सफ़ाई देना।(पृ.50)

• फिर क्यों मेरे भीतर  एक गहरी ऊब और उदासी थी।

(पृ.42)

• मुलाक़ात का नैतिक प्रभाव भी होता है।(पृ.42)

• जैसा भी है जीवन वहीं है।(पृ.29)

• विचार अनुभव को जन्म नहीं दे सकता।(पृ. 36)

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चेखव काफी कम उम्र में (मात्र 44 वर्ष) तपेदिक की बीमारी से दिवंगत हुए। लीडिया अपनी पहली मुलाक़ात का समय जनवरी 24, सन 1889 दर्ज़ करती हैं। आख़िरी मुलाक़ात मई  1899 में पहली मुलाक़ात के लगभग दस बरस बाद मास्को में रेलवे स्टेशन पर होती है। इसके बाद के दो ख़तों का ज़िक्र भी है। सिर्फ़ ख़त। कोई भेंट नहीं। जुलाई 15 ,1904 को चेखव की मृत्यु हो जाती है। इस आखरी मुलाक़ात की बाबत डेविड अपनी भूमिका में लिखते हैं : 

' चेखव की कोई रचना इतनी दारुण पीड़ा से भरी नहीं है  जितनी उस स्त्री से उनकी आख़िरी मुलाक़ात, जिसने  अधिकांश लेखकीय जीवन के दौरान उनकी रचनाओं पर  इतना गहरा प्रभाव डाला।'

लीडिया का ये संस्मरण उनकी इच्छा के अनुरूप मृत्योपरांत (1947 में) छपा। हालांकि प्रकाशन के बाद उनके परिवार ने एतराज  जताया । लीडिया के परिवार वालों के स्तक्षेप से  किताब को वापस लेना पड़ा। 38 बरस लीडिया ने किस कशमकश में गुज़ारे होंगे इसका सिर्फ़ अनुमान ही लगाया जा सकता है। उनकी मृत्यु 78 वर्ष की आयु में 1942 में हुई।

* * *

किताब-काग़ज़ , पन्नों में विद्या ढूढ़ने वाले अब भी यदाकदा टकरा जाते हैं। हम जब बच्चे थे और बड़े हो रहे थे उस वक़्त किताब में फूल , मोर पंख वगैरह रखना आम बात थी। किताब तो किताब काग़ज़ का कोई टुकड़ा पाँव तले आ जाए तो फ़ौरन माथे से लगाया जाता था। डिजिटल हो चुकी कॉपी-किताब की दुनिया में अब ये नज़ारा दुर्लभ हो चला है।

फ़िलहाल , 

 किताबों में विद्या होती है।

  हम्म ..

  होती तो है..

इस एकालाप के साथ हम संस्मरण से रूबरू होते चलते हैं।

पढ़ते हुए बार-बार ये विचार ज़ेहन में उभरता है। मेरी राय में ये संस्मरण विद्या (विजडम) से भरा पड़ा है। ये बात तो साफ़ है कि हमारे अवचेतन की बेचैन हलचल दुःस्वप्न बन जाती है। इसे हम लीडिया और चेखव के मार्फ़त महसूस कर सकते हैं। स्त्रियों को ख़ुद पर मिटा लेने की मर्दों की आदिम लालसा कभी मिटती नहीं , उभर ही आती है। एक ख़ास समय के समाज , परिवेश , संस्कृति , लेखन , पठन -पाठन  , स्त्री और प्रेम के विभिन्न संदर्भों को समझने के लिए लीडिया एविलोव का ये दस्तावेज़ महत्वपूर्ण है। दुनियादारी की तमाम नसीहतें इसमें नत्थी हैं। साथ ही रञ्जना श्रीवास्तव जी का अनुवाद भावप्रवण और सुन्दर है। शब्दों का चुनाव सटीक है। 


* * *

151 पन्नों के इस संस्मरण-अनुवाद में राजेंद्र यादव और डेविड मैगार्शक ने भूमिकाएं लिखी हैं। डेविड ब्रिटिश अनुवादक हैं और रूसी साहित्य ख़ास तौर पर दोस्तोयेव्स्की और निकोलाई गोगोल के साहित्यानुवाद के लिए विशेष प्रसिद्ध हैं। अंग्रेजी से अनुवाद रंजना श्रीवास्तव का है। अनुवादक के रूप में उनका कोई अनुभव शाया नहीं है। हिंदी पाठकों तक पहुँचाने की योजना राजेन्द्र यादव की थी।  प्रकाशन राजकमल , दिल्ली : 2004 का है।

_____________नीलिमा

तस्वीर : लीडिया एविलोव

(


मेरी ज़िंदगी में चेखव : 02)

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