मुअनजोदड़ो : ओम थानवी
किताब का नाम उसे बार बार उलटने -पलटने को बाध्य कर रहा था। इतिहास का कोई भी विद्यार्थी 'मुअनजोदड़ो' की ओर सहज ही आकर्षित होगा। खांटी इतिहास का ब्यौरा न था। यह था एक यात्रा का वृत्तान्त इतिहास के जरूरी पक्षों की पड़ताल करता हुआ। एक तरफ पाकिस्तान है जिसकी चर्चा के बिना हमारा आधुनिक इतिहास पूरा ही नहीं होता तो दूसरी तरफ़ हड़प्पा-मुअनजोदड़ो जिनके ज़िक्र के बिना हमारा प्राचीन इतिहास अधूरा है। अतीत के इन दो सिरों को जोड़ने वाला सन्दर्भ हमें हमारी जड़ों से जोड़ता है। इतिहास को समझने का सिरा हम 'हड़प्पा- मुअनजोदड़ो' से थाम कर ही आगे बढ़ते हैं। इतिहास की यात्रा में हम सम्प्रदायिकता की आग में बेतरह 'पाकिस्तान' में पहली बार झुलसते हैं। इसलिए इस क्षेत्र (मुअनजोदड़ो-पाकिस्तान) के इतिहास, समाज और संस्कृति पर लिखी-पढ़ी गई हर बात पहले-पहल आकर्षित करती है। विश्लेषण-विवेचना का संदर्भ दूसरे क्रम पर आता है।
नाम 'मुअनजोदड़ो' के आकर्षण में ले थी ये किताब। लेना जाया नहीं हुआ। पतली सी 118 पृष्ठों की किताब लेखक के यात्रावृत को समेटे संवेदना और ऐतिहासिक तथ्यों का अमलगम है। भाषा का प्रवाह और रोचकता मनभावन है,आपको कहीं ठहरने नहीं देता। ऐतिहासिक पुरास्थलों के यात्रावृत्त ऐसे ही होने चाहिये। संवेदना और तथ्यों की बानगी इन पंक्तियों में देखी जा सकती है,"मौसम जाड़े का था, पर दुपहर की धूप बहुत कड़ी थी।सारे आलम को जैसे एक फीके रंग में रंगने की कोशिश करती हुई। यह इलाका राजस्थान से बहुत मिलता-जुलता है। रेत के टीले नहीं हैं पर खेत हरे हैं।बाकी वही खुला आकाश और सूना परिवेश।धूल, बबूल। ज़्यादा ठंड, ज़्यादा गरमी। मगर यहां की धूप का मिज़ाज जुदा है।राजस्थान की धूप पारदर्शी है। सिंधु की धूप चौंधियाती है।तस्वीर उतारते वक़्त आप कैमरे में ज़रूरी पुर्जे न घुमाएं तो ऐसा जान पड़ेगा, जैसे दृश्यों के रंग उड़े हुए हों पर इससे एक फायदा हुआ। हमें हर दृश्य पर नज़रें दुबारा फिरानी पड़तीं।इस तरह बार-बार निहारें तो दृश्य ज़ेहन में ठहर जाते हैं जैसे तस्वीर देखकर उनकी याद ताज़ा करने की ज़रूरत शायद कभी न पड़े।वातावरण में सन्नाटा था। एक सधी हुई चुप्पी मगर ठीक सामने, खिड़की के पार, मुअनजोदड़ो का अजायबघर दिखता था।उसकी नंगी ईंटों वाली दीवार पर दो सफ़ेद आकृतियां थीं।एक वृषभ, दूसरा हाथी। पहली ही नज़र में कोई पहचान सकता था कि ये मुअनजोदड़ो की खुदाई में निकली उन मुहरों के विराट रूपाकार हैं, जिन्होंने रातोंरात दुनिया के सामने भारत के इतिहास का ‘नक़्शा’ बदल दिया था।सौ साल पहले भारत का दुनिया में महज़ दावा था कि उसकी सभ्यता प्राचीन है।बीसवीं सदी की देहरी पर मुअनजोदड़ो की खुदाई ने पहले हड़प्पा-कालीबंगा में हो चुकी खुदाई को समान रोशनी में देखा और अन्ततः उस खोज ने सिंधु घाटी को मिस्र और मेसोपोटामिया (इराक) की सुमेरी सभ्यता के समकक्ष ला खड़ा किया।"
ये तो जगह ही ऐसी है जिसके संदर्भ हमारे इतिहास, समाज, राजनीति, धर्म सभी से अभिन्न हैं। अतीत में तो यह महत्वपूर्ण थे ही हमारे वर्तमान को भी प्रभावित करते रहे हैं। इसमें हैरत वाली कोई बात भी नहीं है।इतिहास खंडहरों का नहीं होता। खंडहर तो अतीत की बच गई धड़कन हैं। उनके बीच जाकर हम भटकते नहीं हैं। अपनी जड़ों की पड़ताल करते हैं।
जड़ों की यह पड़ताल ही वर्तमान के वृक्ष को पालने -पोसने,पल्लवित करने में हमारी मदद करती है। हमें वह दृष्टि देती है जिससे पल्लवन की प्रक्रिया को सुचारु बनाया जा सके। इस यात्रावृत्त के कुछ हिस्से दिल को छू जाते हैं। कुछ ऐसे भी हैं जो उन पाठकों को जो इतिहास के तटस्थ अध्येता नहीं हैं अपना नज़रिया दुरुस्त करने को बाध्य करेंगे। कम से कम वे एक बार सोचने को विवश तो जरूर होंगे। आप भी इस पुस्तक/यात्रावृत्त को एक बार जरूर पढ़ें।
_____________नीलिमा
(पुस्तक का नाम:मुअनजोदड़ो/लेखक:ओम थानवी/प्रकाशन:वाणी,नई दिल्ली/वर्ष:2011/पृष्ठ:118)

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