उर्दू की आख़िरी किताब


 'उर्दू की आख़िरी किताब' व्यंग्य विधा की अपनी तरह  की अनोखी किताब है।  इसे टेक्स्ट बुक के फॉर्मेट पर तैयार किया गया है । इसमें प्राइमरी और सेकेंडरी एजुकेशन के प्रमुख विषयों भूगोल ,  इतिहास , व्याकरण , गणित , विज्ञान आदि  पर व्यंगात्मक पाठ और पाठ के अंत में सवाल पूछे गए हैं। 


किताब उर्दू में तंजनिगारी का बेहतरीन नमूना है। इसका पहला संस्करण 1988 में आया था। पूरी किताब हर्फ़ दर हर्फ़ धारदार व्यंग्य है। कचोटने वाली इसकी भाषा आईना दिखती चलती है। नज़ीर देखिए ।


***


▪️हमारा तुम्हारा ख़ुदा बादशाह : इब्ने इंशा


किसी मुल्क एक था बादशाह। बड़ा दानिशमंद ,  मेहरबान और इंसाफ पसंद । उसके जमाने में मुल्क में बहुत तरक्की की और रिआया उसको बहुत पसंद करती थी। इस बात की शहादत  न सिर्फ़ उस जमाने के मोहकमा- ए- इत्तलात( सूचना विभाग) के किताबचों और प्रेस नोटों में मिलती है, बल्कि बादशाह की ख़ुदनविश्त सवा नेह उमरी (आत्मरचित) से भी।


 शाह जमजाह  (ईरान का बादशाह) के जमाने में हर तरफ आजादी का दौर- दौरा था । लोग आज़ाद थे और अख़बार आज़ाद थे।   कि जो चाहे कहें ,  जो चाहे लिखें । बशर्ते कि वह बात शाह की तारीफ़ में हो   ख़िलाफ न हो । 


उस बादशाह का जमाना तरक्की और फतूहात (विजयों) के लिए मशहूर है।  हर तरफ खुशहाली ही खुशहाली नजर आती थी । कहीं तिल धरने की जगह बाकी ना थी । जो लोग लखपति थे ,  देखते ही देखते करोड़पति हो गए। हुस्ने- इंतजाम ऐसा था कि अमीर लोग सोना उछालते - उछालते मुल्क के इस सिरे से उस सिरे तक - बाज अवकात बैरून मुल्क(विदेश) भी चले जाते थे ।


 किसी की मजाल न थी कि पूछे इतना सोना कहां से आया और कहां ले जा रहे हो ? रूहानियत से शगफ था । कई दरवेश उसे हवाई अड्डे पर लेने छोड़ने जाते या उसकी कामरानी के लिए चिल्ले काटते थे। तबीयत में अफ़ू  और दरगुज़र का माद्दा अज़हद था। अगर कोई शिकायत करता था कि फलां शख़्स ने मेरी फलां जायजाद हथिया ली है या फलां कारखाने पर कब्जा कर लिया है तो मुजरिम ख्वाह को बादशाह का कितना करीबी अज़ीज क्यों ना हो वह कमाले-सेर-चश्मी से उसे माफ कर देते , बल्कि शिकायत करने वाले पर खफ़ा होते कि ऐबजोई बुरी बात है । 


जब बादशाह का दिल  हुकूमत से भर गया तो वह अपनी चेक बुक लेकर तारिके दुनिया हो गया और पहाड़ों की तरफ निकल गया । कुछ लोग कहते हैं कि आज भी जिंदा है । वल्लाह  आलम बिस्स्वाब।


***


▪️भैंस : इब्ने इंशा


यह बहुत मशहूर जानवर है । क़द में अक़्ल से थोड़ा बड़ा होता है। चौपायों में यह वाहिद जानवर है कि मौसिक़ी से  जौक़ रखता है।  इसलिए लोग इसके आगे बीन बजाते हैं। किसी और जानवर के आगे नहीं बजाते। भैंस दूध देती है, लेकिन वह नाक़ाफी होता है ।बाकी दूध ग्वाला यानी दूधवाला देता है और दोनों के बाहमी तआवुन से हम शहरियों का काम चलता है । तआवुन अच्छी चीज है , लेकिन दूध को छान लेना चाहिए कि उसमें से मेंढक निकल जाएं। भैंस का घी भी होता है। बाजार में हर जगह मिल जाता है । आलू , चर्बी और विटामिन से भरपूर । लेकिन  ज़्यादा तफ़सील में नहीं जाना चाहिए। आजकल भैस  अंडे नहीं देतीं। मिर्ज़ा ग़ालिब के जमाने में दिया करती  थीं।  हुकमा  पहले रौगने - गुल भैंस के अंडे से निकला करते थे। कई अमराज़ के लिए मुफ़ीदतरीन  साबित होता है।


***


 किताब के केंद्र में संजीदा मसले हैं। सियासत , भारत-पाकिस्तान विभाजन, तारीख़ में मुसलमान शासक , आज़ादी का छद्म , नैतिकता का पाखण्ड , भ्रष्ट राजनीति , ढुलमुल शिक्षा व्यवस्था जैसे मुद्दों को गम्भीर व्यंग में ढाला गया है। 'बाइसे तहरीर आं कि'  यानी लिखने की वजह बताते हुए इब्ने इंशा साफ कहते हैं कि ,  ' ये किताब सिर्फ़ बालिगों के लिए है। जहनी बालिगों के लिए मगमूर नाबालिगों के लिए नहीं ' ।


 उर्दू की आख़िरी किताब हास्य और व्यंग्य के बीच की बारीक रेखा को शिद्दत से हमारे सामने रखती है। हास्य गुदगुदाता है , व्यंग्य चुभता है। तीर निशाने पर लगे तो बन्दा तिलमिला कर रह जाता है। ज़बान तालु पर चिपक जाती है ,  हँसी रफू चक्कर , चेहरे से कोसों दूर। दरअसल व्यंग्य हास्य से आगे का कदम है। दोनों को एक समझना महती भूल। इब्ने इंशा की हाज़िर जवाबी और भाषा के चुटीलेपन से जो लज़्ज़त आती है वह इस किताब को ख़ास बनाती है। 

 

किताब के लेखक इब्ने इंशा हैं ,  लिप्यंतरण और संपादन अब्दुल बिस्मिल्लाह का है ,  चित्रांकन चंचल बी एच यू का। सभी अपने फन में माहिर , दिग्गज। किताब को राजकमल प्रकाशन(दिल्ली) ने प्रकाशित किया है।

मूल्य :150/-


_________नीलिमा


Comments

Popular posts from this blog

तीजनबाई और पण्डवानी

🖤 छूटी आदम से जन्नत : लखनऊ रिविजिटेड - 01

विश्व की प्राचीन सभ्यताएं: नीलिमा पाण्डेय