किताबें जो पढ़ी गयीं : कीड़ा जड़ी
इतिहास पढ़िए तो यह तथ्य पूरी साफ़गोई से सामने आता है कि पूरब को तमाम जानकारियां पश्चिम से पहले हासिल हुईं। कीड़ाजड़ी के मामले में बाज़ी तिब्बत और चीन के हाथ आई। चीनी समाज में हमेशा कीड़ाजड़ी की मांग रही है। दुनिया के सामने इसे लाने का श्रेय भी चीन के एक झक्की एथलेटिक्स कोच के पास रहा। नाम था मा जुनरेन । उसके खिलाड़ियों ने कामयाबी हासिल की , मा के हिस्से भी शोहरत आई। साथ में तमाम आरोप भी लगे।
आरोपों के बीच कीड़ाजड़ी ने साख हासिल की और यौन शक्तिवर्धक की फ़ेहरिस्त में कोहिनूर की तरह चमकने लगी। मीडियाई प्रपंच से लोगों को तमाम मुगालते हुए और कीड़ाजड़ी ब्रांड की तरह स्थापित हो गई । समय के साथ उसका आभामंडल बढ़ता गया। 40 पार के उपभोक्ताओं ने इस आभामंडल से चौंधियाई अपनी आंखों की रोशनी में एक नया बाज़ार पैदा किया।
पहाड़ी गांव-कस्बों में कीड़ाजड़ी ने जो साख हासिल की है उसका पैमाना किसी अलहदा नशा-पत्ती से मिलने वाले सुरूर से कम नहीं है । इस नशे का मर्म 'नशा शराब में होता तो नाचती बोतल' में छुपा हुआ है । कीड़ाजड़ी हासिल करने के मौसम में ग़ज़ब ख़ुमार छाता है। ग़रीबी की रेखा के दाएं-बाएं होती जनता का आकर्षण लाज़िम है । फिर पहाड़ पर सिर्फ़ ग़रीबी तो है नहीं। श्रम को रोकड़े में बदलने के मौके भी बेहद कम हैं । क्या करें लोग? कीड़ाजड़ी हासिल करने की कल्पना में दत्तचित्त अलग ही ख़ुमार में डूब जाते हैं । माल से मिलने वाली पूँजी से होने वाली आमदनी इस ख़ुमार की जद के बाहर की चीज है।
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बहरहाल इस प्रवास वृतांत में कीड़ाजड़ी एक रूपक की तरह मौजूद है। रूपक किस पाठक पर कैसा खुलता है वह उसकी अपनी श्रद्धा पर निर्भर है। कुछ अन्य रूपक भी हैं जिनका इस्तेमाल ख़ूबसूरती से किया गया है। मसलन मकड़जाल (पृष्ठ:56) का बयान लेखक ने कुछ इस अंदाज में किया है कि पढ़ते हुए बचपन से अब तक के तमाम पड़ाव नज़रों के सामने तैर गए। विश्व गुरु के नैरेटिव के कुछ झोंके भी बीच-बीच में आए हैं (पृष्ठ:55) जिन्हें पढ़ते हुए भीतर कुछ दरक जाता है। बशर्ते आप इस नई 'रामराजी व्यवस्था' में नोश न फरमा रहे हों। खैर!
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इतिहास पढ़ते हुए हम "चेंज ओवर द टाइम" के विश्लेषण को लेकर निरंतर जूझते-डूबते रहते हैं। समय के रेखीय विस्तार के बरक्स नूतन-पुरातन की चक्रीय उपस्थिति लगातार बनी रहती है । कीड़ाजड़ी भी अपने अंतिम पृष्ठों में नवीन जीवन चक्र की अपेक्षा उद्यापन की ओर बढ़ती है। ज़िंदगी की मार और जीवन चक्र की सरस प्रवाहित धार की केंद्रीय धुरी पर परिक्रमा करता यह प्रवास वृतांत पढ़ने की प्रक्रिया में हमारे भीतर रचता-बसता जाता है । ताज्जुब ये की यह मौत के एक क़िस्से से शुरू होकर दूसरे पर समाप्त होता है।
शुरुआत और अंत के दोनों सिरों को थामे तीन बच्चे हैं जो रूठते-खीझते , आशंकित-अचंभित होते निरंतर नेपथ्य में उपस्थित हमारे साथ बने रहते हैं। शुरुआत में हम जोती की माँ की मृत्यु पर उदास होते हैं , उसकी बाल सुलभ नादानियों से ख़ुद को लुभाते हुए अंत में उसके पिता की मृत्यु पर अवाक रह जाते हैं। इस प्रवास वृत्तांत में हमारे हमजोली बने बच्चे अनाथ आश्रम में भेज दिए गए हैं। यह सूचना आघात की तरह हम तक पहुँचती है। यह जानते हुए कि हम कथा रस में डूबे होने के बावजूद महज क़िस्सागोई से नहीं गुज़र रहे हैं और मृत्यु के यह बयान सच्चे हैं ; हमारे भीतर एक प्रच्छन्न आघात कुछ देर के लिए ठहर जाता है।
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नामनई दोरजे 1439-1475 तिब्बती पद्धति के चिकित्सक और लामा थे। कीड़ाजड़ी के शुरुआती पन्ने पलटने के साथ हम उनकी कविता से गुज़रते हैं जो अनुवाद पर अनुवाद के रूप में हमें उपलब्ध है। शुरुआत यहीं से । किताब में कोई आमुख , दो शब्द जैसी औपचारिकता नहीं निभाई गई है। इसलिए कविता पाठ कर हम सीधे तीन ग्लेशियरों के तिराहे पर बसी घाटी में कूद पड़ते हैं। जहाँ जोति की माट्टर-माट्टर की गुहार है , उनींदा - चौकन्ना लेखक है , जोती का किस्सा है , खाती गांव है। ललित-खष्टी-गोलू का कंठ में घुटी रुलाई वाला मिलाप है जो उन्हें मौत के दीदार का हौसला थमाता बचपन से हौले-हौले बाहर निकाल रहा है।
साथ ही स्कूल मास्टरों की बच्चों को मूरख बनाए जाने की साज़िशों के बयान हैं। ये बयान धारावाहिक क़िस्तों की तरह उपस्थित हैं क्योंकि मास्टर होने का सबब ही लेखक को पिंडर घाटी में ले आया है। घाटी का परिवेश लेखक को इतना उकसाता है कि मार्फ़त कीड़ाजड़ी एक प्रवास वृतांत पाठकों तक पहुंच जाता है।
चूँकि इस सिलसिले की डोर बच्चों के पढ़ने-पढ़ाने से जुड़ी है शिक्षाशास्त्र से जुड़ी किताबों के विश्लेषण भी शामिल हैं। जिस क़िस्म के बाल मनोविज्ञान का ज़िक्र इन किताबों में मिलता है वह कहीं पीछे छूट गया है। बाल मनोविज्ञान पर बदल रहे परिवेश का असर होता ही है। फिर भी हैं तो बच्चे ही। इसलिए पुराने मानकों पर भी उन्हें काबू में करना आसान है। कुटाई काबू में लाने का आदिम तरीका रहा है। जातीय अस्मिता और कथित अभिजात्यता को ढोने वाले समाज को अपमान और पीड़ा पहुंचा कर मिलने वाले सुख से मुक्त होने में अभी समय लगेगा। बच्चे भी इनकी बलि चढ़ते रहते हैं।
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क्षेत्रीयता के दम्भ से दुनिया का कोई कोना छूटा नहीं है। कीड़ाजड़ी में भी 'पहाड़ बनाम मैदान' की झलकियां हमारी नज़र की जद में आ जाती हैं। यदा-कदा स्त्री द्वेष के छींटे भी दिख जाते हैं । समाज की कड़वी हक़ीक़त है स्त्री द्वेष। प्रसंगवश एक उदाहरण , "औरतें बहुत कमीनी होती हैं ,उन्हीं के कारण आदमी की ज़िंदगी नरक हो रखी है।" (पृष्ठ:19)
जिस परिवेश में ये वृत्तांत रचा गया है वहाँ जीवन और मृत्यु की मेड़ पर फिसलने का अहसास बना रहता है। वहाँ सरकार की दीर्घकालिक विलम्बित योजनाएं और एनजीओ समूहों के जनसरोकार कभी नक्कारखाने में तूती की आवाज़ लगते हैं तो कभी भगीरथ प्रयास।
पिण्डर घाटी में विप्र और नाई दोनों का नदारद होना कौतुक जगाता है। विप्र के क़िस्सों का अम्बार है हमारे समाज में। नाई भी बेशुमार हैं। परम्परा में दोनों साथ-साथ सफ़र करते हैं। दोनों का सफ़र जन्म से शुरू हो वैतरणी पार तक जाता है। क्या वज़ह होगी कि दोनों पिण्डर घाटी से कूच कर गए?
पण्डित-नाई हैं नहीं और औरतें मर कर चिड़िया बन गई हैं। दुःख है कि मरने पर भी उनका पीछा नहीं छोड़ता। चिड़िया बनी कलप-किलस रही हैं। औरतों से इतर बेचैन बाबा रामदेव सेल्फ-वेलिडेशन के लिए तड़पती हुई आत्मा की जोरदार नज़ीर पेश करते हैं।
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वृतांत में भोले (भांग) के तमाम ज़िक्र हैं। फिर भी किताब कहीं बहकी हुई नहीं लगती है। प्रूफ़ बाजदफ़ा ज़रूर बहक गया है। कंजंक्शन - प्रेपोजिशन का भारी मात्रा में अकाल है। हम जैसे एक आम से पाठक का कुछ कहना उचित नहीं लगता है। फिर भी नामचीन प्रकाशकों की प्रूफ़-डेस्क को थोड़ा ध्यान रखना चाहिए।
दी गई जानकारी व्यवस्थित , बारीक और रोमांचक है। 'कीड़ाजड़ी' रूपी भोले का रसास्वादन कर हेलीकॉप्टर बनने का आनन्द उठाएं । वृत्तांत पर प्रतिक्रिया को एक शब्द में समेटना हो तो हम कहेंगे : धारदार।
____________नीलिमा

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