किताबें जो पढ़ी गयीं: कीड़ा जड़ी

 हिंद पॉकेट बुक्स-पेंग्विन से प्रकाशित कीड़ाजड़ी चर्चा में है। यह एक प्रवास वृतांत है। वृतांत पर प्रतिक्रिया को एक शब्द में समेटना हो तो हम कहेंगे : धारदार । 

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कीड़ाजड़ी शब्द पहली बार हमने हल्द्वानी में सुना। इस वजह से इस किताब का नाम पढ़ते ही हम अपने हल्द्वानी प्रवास के नॉस्टैल्जिया में डूब गए। फ़िलहाल हल्द्वानी से जुड़ी हुई कुछ बातें जो कीड़ाजड़ी नाम पढ़कर उमड़ पड़ी हैं।

कीड़ाजड़ी का विवरण जानने के बाद यह पता चला कि इसी को यारसागुंबा कहते हैं । यारसागुंबा के बारे में पहले- पहल किसी अखबार में पढ़ा था। उसके बाद करंट इवेंट्स की पत्रिकाओं में पढ़ा।

 हल्द्वानी प्रवास के दौरान आए दिन अखबारों में कीड़ाजड़ी के चर्चा रहती । कुछ जड़ी बूटियां बेचने वाले भी गली-मोहल्लों में आते-जाते रहते थे। उत्सुकता वश जानकारी हासिल करने पर पता चला कीड़ाजड़ी एक तरह का जंगली मशरूम है जो  हैपिलस फैब्रिक्स नाम के एक कीड़े के ऊपर उगता है। पीले-भूरे रंग की इस जड़ी का लगभग आधा हिस्सा कीड़ा और शेष जड़ी जैसा दिखता है । इसलिए इसे आम बोलचाल की भाषा में कीड़ाजड़ी कहा जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम कॉर्डीसेप्स साइनेसिस है । 3500 से लेकर 5000 मीटर तक की ऊंचाई पर यह जड़ी मिलती है।

चूंकि हम कुमाऊं में थे धारचूला के हवाले से इसका ज़िक्र अक्सर आता था। अन्य हिमालयी क्षेत्रों (चीन,नेपाल,भूटान ) से भी यह उपलब्ध है। गढ़वाल में चमोली के लोगों में इसका रोजगार प्रचलित है । नेचुरल स्टेरॉइड की तरह प्रयोग में लाई जाने वाली यह जड़ी श्वसन रोगों , गुर्दे की बीमारी और कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होती है।  हालांकि इसकी सर्वाधिक चर्चा यौन शक्तिवर्धक के रूप में है। अच्छी बर्फ के बीच यह बेहतर फलती-फूलती है।  बर्फबारी कम होने पर इसकी फसल प्रभावित होती है।  पिघलने पर लगभग 2 इंच लंबाई की भूरे रंग की जड़ी दर्शन देती है। अपने नायाब गुणों की वजह से तस्करी बाजार की यह पहली पसंद है। इसकी कीमत 15 से 20 लाख है ।

स्थानीय लोग जो इसको बेचते हैं इतने निरीह और दयनीय देखते हैं कि लगता है कोई दबंग इनसे यह कीमती जड़ी छीन-झपट ही न ले। यही वजह है कि कीड़ाजड़ी बेचने वाले स्थानीय लोग जब गली-मोहल्लों में आते हैं तो ठीक - ठाक गोपनीयता बरतते हैं और विश्वसनीयता अर्जित करने के बाद ही खुलते हैं। उनके पास उपलब्ध भांति-भांति की औषधि कारक जड़ियो ,  केसर वगैरह के बीच कीड़ाजड़ी का दर्ज़ा कोहिनूर  सरीखा होता है।

खाती गाँव का संदर्भ भी यादों को उलझाने वाला रहा। हल्द्वानी में हम सिविल लाइंस में रहते थे। वहीं सरकारी महकमे के एक अफ़सर खाती जी से भेंट हुई। भारीभरकम काया वाले (ओवर वेट) खाती जी कई परिचरो के सहयोग से उठ-बैठ पाते थे। 60 बरस को छूती उम्र में भी अपने पिता जी से किशोर वय के बालक की तरह घबराते थे। उनकी  भारी काया , अफ़सरी रुआब और सुरा-सेवन से दीप्त डूबी हुई आँखे उनके चेहरे की भोली-भाली बाल सुलभ मुस्कान से तालमेल बिठाने में असमर्थ रहते। ऐसा लगता आयातित मुस्कान अलग से चेहरे पर चिपका दी गयी है।बातचीत के सिलसिले में  खाती जी से ही यह पता चला कि उत्तराखंड में जाति-नाम सूचक गाँव हैं। ज्यादातर जातियों के नाम उनके पैतृक गांवों के नामों पर पड़े हैं।

जोती, ममता, हेमा , पूर्णिमा , दीवान, खजान , रूप सिंह , चामू ,  दामू  पहाड़ में पैबस्त हैं। इस किताब में भी इनमें से कुछ ज़िन्दगी की लय पर थिरक रहे हैं। माट्टर पुकारती एक जोती के ज़िक्र से यादों की रहगुज़र से ढेर सारी जोती दौड़ती हुई चली आती हैं। पढ़ते हुए ठिठक कर हम उनके बारे में सोचने लगते हैं। बोली-बानी और कुमाउँनी लहजे में बोली जाने वाली हिन्दी की अपनी यादें हैं। तक़रीबन 21 बरस कुमाऊँ में गुज़रे हैं। कीड़ाजड़ी पढ़ते हुए कुमाऊँ से जुड़ी ढेर सारी यादें मानो झाड़-पोछ कर चमका दी गईं। किताब के पन्नो पर दर्ज़ सफ़र के समानांतर हमारी यादों का सफ़र भी जारी रहा। 

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हमारे उपमहाद्वीप का ओर-छोर दुःख में डूबा हुआ है। अधिसंख्य जनसंख्या के जीवन में सुख नहीं है। दुःख की इस ऊब-डूब को कीड़ाजड़ी में शिद्दत से महसूस किया जा सकता है। इस प्रवास वृत्तान्त की कई परते हैं। पढ़ते हुए उनके सिरे उघड़ते रहते हैं। लेखक ने पर्यावरण, राजनीति, लालफीताशाही, लोक संस्कृति पर पैनी नज़र रखते हुए वृत्तान्त को लिखा है जिसकी केंद्रीय धुरी के रूप में हम अर्थ की व्यवस्था को पाते हैं। इसे पढ़ते हुए  जिजीविषा की जद्दोजहद और जीवन के यथार्थ को आप बख़ूबी महसूस कर सकते हैं।


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हमारे शहर में किताबें बुक स्टोर्स पर आज भी आराम से मिल जाती हैं। प्रकाशन की सूचना के बाद अमेजन पर 30 नवम्बर को बुक की गई किताब की प्रति आज तक मुझे नहीं मिल पाई है। न ही उससे संबंधित कोई सूचना उपलब्ध है कि देर होने की वजह क्या है ? इस बीच शहर के बुक स्टोर ने  दिसम्बर की 02 तारीख़ को पुस्तक उपलब्ध करवा दी। वही पढ़ी गयी। अमेजन का आर्डर अभी भी प्रतीक्षित है इस उम्मीद में की वह प्रति किसी जिज्ञासु को भेंट कर देंगे। किताब पर इत्मीनान से लिखेंगे। यूँ भी हम थोड़ा ठहर कर की लिख पाते हैं।



© नीलिमा पांडेय

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