संस्मरण : लौट आ ओ धार
"इलाहाबाद के मैकफर्सन पार्क के पीछे की कब्रगाह 'पवित्र रक्त' वाले अंग्रेजों की क़ब्रगाह है। काफ़ी बड़े क्षेत्र में- पत्थर की चारदीवारी से घिरी हुई।चारदीवारी बदस्तूर कायम है,और कब्रें भी। कैंटोनमेंट में होने के कारण या कब्रों मे सोये अंग्रेज़ अफसरों, सिपाहियों या उनके परिवार के लोंगों के औपनिवेशिक प्रेतात्मा-भय के कारण,या भारतीय जनता के सरल आदर-भाव के कारण।
बरसात में पूरी क़ब्रगाह पर सरपत उग आता है। सितंबर-अक्टूबर तक सफेद कांस की लंबूतरी फुल-छड़ियाँ हवा में सरसराती हुई हिलती रहती हैं।सरपत की कटाई पर छोटी-बड़ी कब्रें ;उनके वितान,क्रॉस और कँगूरे, या छोटी-बड़ी शिला पट्टियां और नक़्क़ाशीदार छतों की ओढ़नी खुल जाती है।मटमैली,कत्थई कब्रें अपनी विनम्र शांति में जाड़े की दोपहरिया में धूप सेकती हैं। उन कब्रों के समाधि लेख पढ़ने लायक हैं। दिन और तारीखों के अलावा बाइबिल की सूक्तियाँ या माता-पिताओं के शब्दबद्ध हाहाकार।
कहीं-कहीं कीट्स और शेली की कविताओं के टुकड़े और एक जगह शेक्सपियर की वह प्रसिद्ध पंक्ति - 'फ्रेलिटी दाइ नेम इज़ वुमन'। पता नहीं,उस अंग्रेज़ औरत ने ऐसा क्या किया होगा। शायद लड़ाई पर गए पति के साथ विश्वासघात। शायद प्रेम की उत्कट अभिलाषा में ध्वंस पर उतर आई होगी वह। या शायद उस अंग्रेज़ ने शेक्सपियर को ठीक समझा नहीं होगा। लेकिन अगर ठीक से समझा हो , तब शेक्सपियर की यह पंक्ति एक कलंक की तरह उसकी क़ब्र पर उत्कीर्ण है।
तो क्या उसे मरने के बाद भी क्षमा नहीं किया जा सकता था? क्या सारी दुनिया के लोग औरतों के प्रति ऐसे ही दकियानूस होते हैं और उन्हें क्षमा नहीं करते। या , क्या वह औरत किसी हिंदुस्तानी सिपाही के प्रेम में घुल गई होगी और उसे शेक्सपियर को लगाकर तब तक के लिए यह गाली दी गई होगी , जब तक क़ब्र पर उत्कीर्ण इस पट्टी को उखाड़ कर फेंक नहीं दिया जाता?"
- संस्मरण 'लौट आ ओ धार' से/ (दूधनाथ सिंह)
▪️ तस्वीर : नीलिमा

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