किताबें जो पढ़ी गयीं : राष्ट्र और प्रेम

 ■ राष्ट्र और प्रेम 


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हरी स्याही में सीझे खतों का यह सिलसिला अपने परिवेश , कहन , किस्सों और विमर्श में हमें भी अपने साथ बहा ले जाता है। अस्सी ख़तों के ख़ाके से गुज़रता है यह उपन्यास । ख़त वो जो गांधी जी ने लिखे सरला को। जवाबी  ख़तों में महज 04 का ज़िक्र है। शेष जला दिए गए। एक सूचना की तरह जब यह बात काग़ज़ पर उभरती है तो कातर कर जाती है । कातरता का भाव हैरान करता हुआ प्रश्न सूचक क्यों में झूल जाता है। गांधी जी ने व्यक्तिगत और सार्वजनिक का भेद मिटाकर 'महात्मा' का लक़ब हासिल किया। उनके 'निजी' ख़तों के साथ इस क़िस्म का हिंसक व्यवहार निहायत ही गैर ज़िम्मेदाराना है । हालांकि इस निजी-सार्वजनिक पर प्रश्न चिन्ह 'सत्य के प्रयोग' से भी लगता है। सरला देवी चौधरानी का ज़िक्र गांधी जी अपनी आत्मकथा में नहीं करते हैं। 

बहरहाल प्रेम के बारे में पढ़ते हुए सिर्फ़ प्रेम ही बचता है। संवेदना के स्तर पर आप इतने गहरे जुड़ते हैं कि असल किरदार प्रेम के बर-अक्स धूमिल पड़ जाते हैं । ख़तों के इस सिलसिले में एक वक़्त के बाद जीत-हार , खोया-पाया का द्वंद सर उठाने लगता है। जैसे-जैसे ये संदर्भ बढ़ते जाते हैं तुर्श होती बातचीत प्रेम की तरलता को रौंद देती है। अथाह प्रेम का दावा पितृसत्ता के चोले में चहल-कदमी करने लगता है।  अंत तक आते-आते मालिकाना हक की अदम्य लालसा सर उठाने लगती है जिसकी परिणीति निराशाजनक है। सहज साथ और सखा भाव के बीच उमगती हँसी अंत तक आते-आते  'एकला चोलो रे' का हाथ थाम बुझ जाती है।

इतिहास के दस्तावेज़ो को पढ़कर इस प्रेम ('गांधी और सरला देवी चौधरानी') से जुड़े जवाब तो सब हमें हासिल ही हैं । क्यों-क्या-कैसे जैसे सवालों की मनोवैज्ञानिक पड़ताल की दरकार ज़रूर है। एक सवाल लगातार खटकता है कि न्याय के लिए तमाम मोर्चों पर कमर कस कर डटा रहने वाला पुरुष  एक स्त्री के आत्मसम्मान को आत्माभिमान समझने की चूक कैसे कर गया ?

'गांधी और सरला देवी चौधरानी : बारह अध्याय '  महज क़िस्सागोई नहीं है। यह एक ऐतिहासिक सच का बयान भी है जो लेखकीय प्रतिबद्धता और ईमान के साथ हमें हासिल है। 

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अलका सरावगी का यह उपन्यास सौ साल पहले घटे जलियांवाला बाग हत्याकांड के समय के उन विस्मृत किरदारों की एक गाथा है जो इतिहास की धूप-छांव के बीच अपनी जगह बनाने में , अपने रूपक की तलाश में नये अध्याय रचते हैं । ऐसे ही बारह अध्यायों की एक कहानी है : गांधी और सरला देवी चौधरानी की। यह सरला देवी से हमें रुबरु करवाने के साथ साथ गांधी के जीवन के तमाम अनदेखे पक्षों को भी उद्घाटित करती है। ख़ासकर स्त्रियों के प्रति उनके नज़रिये को  हम क़रीब से समझ पाते हैं। कैसे एक मनुष्य जीवन जीने के  तरीक़े में , देश के लिए लड़ने में , प्रेम करने में नैतिकता बरतता है , इससे वाकिफ़ होते हैं। साथ ही हम ये भी जानते हैं कि कैसे समाजिक सांस्कृतिकरण और परिवेश तमाम नैतिकताओं पर भारी पड़ता है। सरला देवी चौधरानी और गांधी पर लिखा यह उपन्यास महात्मा गांधी के मन की एक व्यक्ति के रूप में थाह देता है।

लेखक : अलका सरावगी , प्रकाशक : वाणी प्रकाशन , नई दिल्ली , मूल्य: 299 (पेपर बैक) , जनवरी , 2023 , पृष्ठ : 216


(विस्तार से जल्दी ही)


_____________नीलिमा

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