किताबें जो पढ़ी गयीं: काफ्का के संस्मरण


 बीसवीं सदी के महत्वपूर्ण लेखक फ्रांज़ काफ्का के जीवन , व्यक्तित्व और रचना जगत की आत्मीय दुनिया इस पुस्तक में खुलती है । गुस्ताव जैनुक एक युवा लेखक थे जिन्हें फ्रांज़ काफ्का के आख़िरी वर्षों में उनकी निकटता हासिल हुई थी।जैनुक ने उन्हीं दिनों काफ्का के साथ हुई अपनी मुलाक़ातों का ब्योरा लिख छोड़ा है। 


यह मुलाक़ातें तत्कालीन समाज  के महत्वपूर्ण प्रश्नों पर काफ्का के विचारों की साक्षी बनीं। इनमें साहित्य , समाज , इतिहास से लेकर व्यक्तिगत जीवन तक ढेरों विषयों और मुद्दों पर काफ्का की गहरी दृष्टि का परिचय मिलता है । जैनुक ने  अपने उन दिनों को और काफ्का के अंतरजगत को इतने तादात्म्य के साथ लिखा है कि यह रचना स्वयं में सृजनात्मक अनुभव का साक्षात बन गई है।


★★★


नज़ीर के तौर पर कुछ अंश :


''यदि हर चीज नष्ट हो चुकी होती तो हम नई संभावना की दहलीज पर खड़े होते। लेकिन अभी हम उस बिंदु तक नहीं पहुंचे इसलिए बाहर का रास्ता नहीं सूझता। रास्ता अदृश्य है और इसके साथ ही भविष्य के सारी संभावनाएं भी । हम एक  नैराश्यपूर्ण क्षरण से गुजर रहे हैं।  इस खिड़की से बाहर देखो। और एक नजर में तुम्हें पूरा संसार देख जाएगा ।


इतने सारे लोग कहां से आ रहे हैं और कहां जा रहे हैं ? ये क्या कहना चाहते हैं ? यह चीजों की पुरानी मूल्य आश्रित व्यवस्था में विश्वास नहीं करते। इतने शोरगुल और भीड़ से घिरा होने के बावजूद हर व्यक्ति अंदर से भयावह रूप से अकेला है । व्यक्तिगत और वस्तुगत मूल्यों का अंतर्संबंध अब निष्प्रभावी हो चुका है।  


हम एक  ध्वस्त नहीं बल्कि भौंचक दुनिया में रहते हैं । जो उफनती लहरों के बीच जंग खाए जहाज की तरह दरक और शोर कर रही है। एर्जब्रिज में तुमने और तुम्हारे भाई लोगों ने लोगों की जो करुण दशा देखी वह एक गहरी विभीषिका की सतही अभिव्यक्ति भर है।"


_____


"एक पतझर की शाम, बाग में पत्र हीन वृक्षों के नीचे से गुजरते हुए काफ्का ने मुझसे कहा इसमें टूटने या रुकने का सवाल नहीं। सवाल अपने आंतरिक उद्वेग को जीतने का है , जो स्वयं पर अपनी जीत से शुरू होता है । तुम इससे बच नहीं सकते क्योंकि अपनी राह छोड़ देने का मतलब होता है - अपना हजार टुकड़ों में बिखर जाना । 


मनुष्य को अपनी हर परिस्थिति को स्वीकृति देनी चाहिए ।उसे आत्मसात कर अपने अंदर उगने देना चाहिए । भय के अवरोधों को सिर्फ प्रेम के सहारे लांघा जा सकता है। पतझर में झरते जीर्ण पत्रों के साथ ,  उनके बीच फूटते हुए अंकुरों को भी देखना चाहिए और धैर्य से इंतजार करना चाहिए। धैर्य ही वह  आधार है जहां हम अपने सपने के सच होने की उम्मीद कर सकते हैं । "


_____


"कितनी बार न्याय के नाम पर अन्याय नहीं होता, पुण्य का झंडा उठाकर पाप नहीं चलता, पतन को उत्थान के रूप में पेश नहीं किया जाता? अब तो यह साफ-साफ दिखने लगा है कि युद्ध ने इस संसार को सिर्फ जलाया और तार-तार ही नहीं किया, उसे प्रज्वल्लित भी कर दिया है। हम देख रहे हैं कि यह मनुष्य का मनुष्य के लिए बुना गया जाल है। बर्फानी-मशीनी मानवों की दुनिया, जिसकी ऐशपरस्ती और मकसद हमें लगातार कमजोर और अपमानित करते हैं। ''


_____


'' मरना एक मानवीय प्रक्रिया है, इसलिये मनुष्य मरते हैं, लेकिन बंदर समूची मानव जाति में जीवित रहता है.. यह अतीत से प्राप्त एक कठघरे के अलावा कुछ नहीं, जिसमें भविष्य की सपनीली सलाखें जुड़ी हुई हैं।''


_____


''मैं एस्कीमों नहीं, लेकिन आज के बहुसंख्यक लोगों की तरह मैं भी घोर शीत में रहता हूं। जबकि हमारे पास न तो एस्कीमों जैसे रोएंदार पोशाक हैं, न उन जैसे जीने के दूसरे साधन। उनकी तुलना में हम एकदम नंगे हैं। आज की दुनिया में गर्म वे ही हैं, जो भेड़ों की खाल में हैं।''


_____


''सच जो जीवन की कुछ अमूल्य चीजों में से एक है, खरीदा नहीं जा सकता है। प्रेम और सौंदर्य की तरह सच भी मनुष्य को एक भेंट के रूप में मिलता है मगर अखबार एक जिंस है, जिसे खरीदा और बेचा जा सकता है।''


★★★


  गुस्ताव जैनुक लिखते हैं कि , 'संक्षेप में यह काफ्का  का जीवन दर्शन था,  जिसकी अमिट छाप उन्होंने मेरे मन पर छोड़ी और मैंने ग्रहण करने में कोई चूक नहीं की। यह वे सिद्धांत थे जिनके सत्य के प्रति  उन्होंने मुझे अपने स्वर ,  मुद्राओं और आंखों में आने वाले भाव से आश्वस्त किया था।


______


गुस्ताव जैनुक का यह संस्मरण प्रथम विश्व युद्ध के बाद के समय में दर्ज़ हो रहा था। इस पूरे स्मृति-रेख में काफ्का एक अवसाद ग्रस्त निराश आदमी की तरह उभरते हैं। उनकी रचनाएं भी आधुनिक समाज से व्यग्र अलगाव को चित्रित करती हैं। यूँ ही नहीं उनका टाइटल काफ्काएस्क (Kafkaesque)  के रूप में विचित्र-जटिल के संदर्भ में अंग्रेजी शब्दकोश का हिस्सा बन गया। इस शब्द का इस्तेमाल अक्सर विचित्र और अव्यक्तिक प्रशासनिक स्थितियों पर लागू होता है जहां व्यक्ति परिस्थितियों को समझने और नियंत्रित करने में शक्तिहीन महसूस करता है। उसे समझ नहीं आता है  कि क्या हो रहा है?  यहूदी होने की परवरिश और परिवेश का भी का काफ्का के मनोविज्ञान पर असर दिखता है।

____


 काफ्का के संस्मरण को पढ़ते हुए जब हम स्त्री संदर्भों की तलाश करते हैं या फेमिनिस्ट रीडिंग करते हैं तो बात वही  'ढाक के तीन पात' वाली मिलती है।  साहित्य कोई हो स्त्रियों के लिए सदाशयता ढूंढ पाना एक मुश्किल काम है। काफ्का की रचनाओं को पढ़ते हुए भी यही महसूस होता है। गुस्ताव जैनुक द्वारा लिखे गए इस संस्मरण से गुज़रते हुए यह राय पुख़्ता होती है। राई-रत्ती भर सदाशयता भी ना मिल पाना कभी-कभी बेहद हैरान कर देता है। जैसे ही आप स्त्री के प्रति  सदाशयता ढूंढने निकलते हैं बाट जोहने के अलावा कुछ हाथ  नहीं आता। सदाशयता की यह पड़ताल स्त्री के स्वतंत्र इकाई वाले रूप से संबंधित है। नातेदारी-रिश्तेदारी के मानकों पर उन्हें बाजदफ़ा खरी प्रशंसा मिलती है। लेकिन जैसे ही मुद्दा एक स्वतंत्र इकाई के रूप में उभरता है जो अक्सर स्त्री-पुरुष संबंधों की परिधि में होता है संतुलन, शिष्टाचार, व्यवहार सब कुछ डावांडोल हो जाता है।


_____


दिनांक 28 -01-1918 को लिखे अपने एक पत्र में  काफ्का ने कहा : 

आश्चर्यजनक है कि महिलाओं में कितना कम विवेक है। वे केवल इस बात पर ध्यान देती हैं कि क्या वे आपको आकर्षित करती हैं। या क्या आपको उनके लिये दया आती है। या क्या अंत में आप उनसे करुणा चाहते है ।


[ In one of his letters dated January 28, 1918, Kafka states, “Amazing how little discernment women have; they only notice whether they attract you, or whether you have pity for them, or finally whether you look for compassion from them.

 That is all; though in general that is enough”]


(संवाद प्रकाशन , विश्व ग्रन्थमाला , 2006 , पृष्ठ :155 , मूल्य : ₹160 , मेरठ : उत्तर प्रदेश)


नोट : इस किताब का हिंदी अनुवाद वल्लभ सिद्धार्थ ने किया है।

Comments

Popular posts from this blog

तीजनबाई और पण्डवानी

🖤 छूटी आदम से जन्नत : लखनऊ रिविजिटेड - 01

विश्व की प्राचीन सभ्यताएं: नीलिमा पाण्डेय