▪️दुनिया में औरत : 21
बच्चे अक्सर खाने पीने में ना-नुकुर करते हैं । ख़ासकर दूध पीने के साथ उनका 36 का आंकड़ा होता है । हम सब के पास बचपन में खाने-पीने को लेकर डांट-फटकार सुनने की यादें हैं। हम एक-दो गिलास दूध पीने में दसियों बहाने बनाते थे। लेकिन अगर किसी 6 बरस की बच्ची को दिन भर में 20 लीटर दूध पीने का फरमान ज़ारी हो तो उसके दिल पर क्या गुज़रेगी। 20 लीटर .. सुनकर ही अजीब लगता है हमें । लेकिन मॉरीतानिया की बच्चियों के लिए यह एक कड़वा सच है ।
मॉरीतानिया एक अफ्रीकी देश है। यहाँ के समाज में एक रिवाज़ है जैसे लवलूह के नाम से जाना जाता है । इस रिवाज में 5 से 19 बरस की लड़कियों को जबरदस्ती खिलाने की परंपरा है। यह उन देशों में प्रचलित है जहाँ पारम्परिक रूप से स्त्रियों के मोटापे को वांछनीय माना जाता है। मॉरीतानिया के अलावा इस परंपरा का प्रचलन अफ्रीका के अन्य कई देशों में भी है
लवलूह नामक इस रिवाज़ की प्राचीनता 11वीं शताब्दी ईस्वी बताई जाती है। मॉरीतानिया में 2008 के बाद से इस पर सरकार की तरफ से विशेष जोर दिया जाने लगा है । वजह वहां की सत्ता में 'मिलिट्री-जनता' का आना है जो परम्परागत रूढ़िवादी सामाजिक ढाँचे की हिमायती है। उनका चुनावी स्लोगन ही पंरपरा कीओर वापस लौटने का था। अपने व्यवहार में आधुनिकता विरोधी सरकार के प्रश्रय जड़ परंपराओं में रुचि लेने वालों की बन आयी।
लवलूह के फंदे में फंसी लड़कियों को 20 लीटर दूध , पाव भर मक्खन , 02 किलो अनाज हर दिन खाना होता है । खाना खिलाने की जिम्मेदारी उनकी माँ के ऊपर होती है जो अपने दिल के अतल गहराइयों से यह माने बैठी हैं कि वे अपनी बच्चियों का भला कर रही है ।
प्रतिदिन लवलूह की शिकार बच्ची को 14,000 से 16,000 कैलोरी का सवन करना पड़ता है । किसी क़िस्म की आनाकानी या ना-नुकुर की कोई गुंजाइश उनके पास नहीं होती। ज़िद्दी लड़कियों को काबू में लाने के लिए पुराना अस्त्र कुटाई का रहा है । मारने -पीटने के अलावा दो लट्ठों के बीच उनके पैर को चांत दिया जाता है। ज़िद में कूदने-फाँदने पर टांग तोड़ देने वाली धमकी तो इधर उत्तर भारत में भी ख़ूब चलती हैं । हम सबने इसे सुना ही है।
इस रिवाज़ के मूल में अच्छा घर-वर और आर्थिक सुरक्षा है। जो आमतौर पर लड़कियों को सुंदरता और शालीनता के एवज में हासिल होती है। मॉरीतानिया और अन्य अफ्रीकी देशों में मोटापा लड़कियों की सुंदरता का मानक है।लड़की जितनी मोटी होगी उतनी ही सुन्दर मानी जाएगी। इसीलिए लड़कियों की माएँ 5-6 बरस की उम्र से उन्हें मोटा करने के एकसूत्री कायर्क्रम में लग जाती है। इससे लड़कियों का जीवन नरक हो जाता है। शरीर के साथ ये अत्याचार उनको मनोवैज्ञानिक रूप से भी प्रभावित करता है। भविष्य के घर-वर उनको कितना सुख दे पाते हैं कहना मुश्किल है।
बहरहाल इस तरह की कुरीतियों से हासिल तो क्या होगा। चौदह तरह की बीमारियां जरूर उन्हें घेर कर लेते हैं और वह मानसिक तथा शारीरिक दोनों स्तरों पर ताउम्र तकलीफ़ में रहती हैं।
________________नीलिमा
#womenaroundtheworld*
#स्त्री_21
(*End of series)



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