▪️दुनिया में औरत :18
'पाकिस्तानी स्त्री: यातना और संघर्ष' ज़ाहिदा हिना की किताब है। नाम से साफ़ है कि किताब के केंद्र में पाकिस्तान की स्त्रियों का दुःख-दर्द है। ये अलग बात है कि जब हम किताब से रूबरू होते हैं तो यह स्त्रियों का साझा दर्द लगता है। दुनिया के कोने जरूर बंटे हुए हैं लेकिन उनमें बसने वाली औरतों की दुनिया लगभग एक सी ही है। आसुंओं के खारेपन में डूबी हुई..
हर कौम ने अपनी औरत को कभी ख़ुदा का वास्ता दिया तो कभी दुनियादारी का। ख़ुदा और दुनियादारी की आड़ में उसके हक़ मारे जाते रहे। कभी उसे आसमानी हवाओं से बहकाया गया तो कभी ज़मीनी संहिताओं में दर्ज़ बर्बर नियम-कानून उसे दहला गए। स्त्री अपने बरदाश्त की हद बढ़ाती रही , ज़ुल्म भी बढ़ते रहे ।
फ़िर धीरे-धीरे वक़्त बदला। ज़माने की बदलती हुई हवाओं ने औरत पर भी असर डाला। उसके ज़ेहन पर पड़ी हुई सदियों की गर्द हवा के झोकों से कुछ तो अपने आप उड़ी और कुछ औरतों ने उसे साफ़ करने के ख़ुद हाथ-पाँव मारे। उसने मन में दबे हुए सवालों को आवाज़ देनी शुरू की। उसके ज़ेहन में एक सौ ख़्याल और उनकी बाबत एक हज़ार सवाल पैदा हुए। इन ख़यालों और सवालों से सूरत-ए-हाल कुछ तो बदला लेकिन बहुत कुछ अभी बदलना बाक़ी है। इस बदलाव की हर औरत शिद्दत से आस लगाए बैठी है। फ़िर वो पाकिस्तान की हो या हिंदुस्तान की। ईरान की हो या इंगलिस्तान की।
आदम और हव्वा का क़िस्सा हम जानते ही हैं। दरअसल, इस दूर तक फैली ज़मीन पर सारी रौनक हव्वा के दम से है, वरना आदम का इरादा तो यह था कि ख़ुदा के बंदे ख़ुदा के हर हुक्म पर सर झुकाते हुए बाग-ए-अदन यानी 'जन्नत के बाग' में ज़िंदगी कभी न खत्म होने वाले समय तक गुज़ार दें। यह हव्वा थी जिसके अंदर जिज्ञासा थी, जिसने साँप के रूप में आनेवाले इब्लीस (शैतान) से संवाद किया। अच्छे-बुरे की पहचान कराने वाले पेड़ का फल खुद खाया और आदम को भी खिलाया। लेकिन ज़मीन पर कदम रखते ही उसकी क़िस्मत बदल गयी।
आदम और हव्वा का ये क़िस्सा मिथक ज़रूर है पर इस सवाल को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता कि साथ-साथ शुरू होने वाले सफ़र में औरत क्यों बराबर पीछे छूटती गई। ऐसा क्यों हुआ? यह गहन शोध का विषय है।
_______________नीलिमा
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