▪️दुनिया में औरत :17

 ज़ाहिदा हिना को पढ़ते* हुए..

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''1840 में फैक्ट्री की फ्रांसीसी श्रमिक स्त्रियां 15 घंटे की जो पगार पाती थीं वह उतने ही घंटे के लिए पुरुषों को दिए जाने वाले पगार से कम ही नहीं, आधी थी। फ्रांसीसी क्रांति का यह एक त्रासद पक्ष है की वे राजनीतिक क्लब, स्त्रियां जिनका प्राण थीं और जिन्होंने क्रांति के लिए अपनी जान की परवाह भी नहीं की थी , 1793 में उन पर प्रतिबंध लगा दिया गया और राजनीति में औरतों की हिस्सेदारी पर और अप्रसन्नता प्रकट की जाने लगी। क्रांति की बेला में समानता का नारा लगाया था और इस नारे ने औरतों को बहुत लुभाया था।


पेरिस के नागरिकों का वह हुजूम जो बादशाह और मलिका को उनके महल से निकाल कर लाया था , उनमें बहुत संख्या औरतों की थी परंतु क्रांति की सफलता के बाद इन औरतों की बेमिसाल कुर्बानी को भुला दिया गया। क्रांति के उपरांत जब क्रांतिकारी समिति का इजलास हुआ तो समिति के एक न्यायप्रिय सदस्य ने प्रस्ताव प्रस्तुत किया कि महिलाओं को भी वोट देने का अधिकार मिलना चाहिए। इस प्रस्ताव पर उस शरीफ आदमी का बहुत मजाक उड़ाया गया तथा समिति के एक दूसरे सदस्य ने कटाक्ष किया कि क्या फ्रांस में कोई ऐसी पत्नी है, जिसमें यह कहने का साहस हो कि वह अपने पति की इच्छा के विपरीत भी कुछ कहने या सोचने की इच्छा रखती है? इसके साथ ही फ्रांसीसी क्रांति में भागीदारी करने वाली महिलाओं ने समानता के जो स्वप्न बुने थे वह भाप बनकर उड़ गए। 

19वीं सदी की फ्रांसीसी औरत छोटे-छोटे अधिकारों के लिए तरसती रही। सरकारी नौकरी में वह केवल अध्यापिका अथवा डाकिया के रूप में भर्ती हो सकती थी। कानूनी तौर पर घर के खर्च पुरुष के हाथ में थे तथा विवाह से इतर दैहिक संबंधों का दंड पुरुष को नहीं , केवल स्त्री को दिया जाता था।''

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''हजारों वर्ष का ज्ञात इतिहास पढ़ जाइए , औरत उसके महज हाशिये पर नजर आती है , विस्मृति की धुंध में लिपटी एक अर्धमानव प्राणी। हतशेप्सुत् , नफ्रेतीती , क्लियोपेट्रा, मलिका-ए-जब्बा, ज़नूबिया, शिज़रतुल दर ओलग्रा, इन्ज़ाबेला प्रथम , कैथरीन द ग्रेट, तुर्कानम ख़ातूनम नूरमहल , चांदबीबी, लक्ष्मीबाई और हज़रत महल के नाम हमें इतिहास के पृष्ठों पर मिलते हैं , लेकिन ये  कुलीन महिलाएं हैं और अपने लिंग की नुमाइंदा नहीं कही जा सकती। इस्लाम के इतिहास पर नजर डालिए तो वह आरंभ ही ख़दीजा के नाम से होता है। आयशा,  फ़ात्मा , ज़ैनब बिन्ते अली , राबिया बसरी पवित्रता के लबादे में लिपटी हुई हैं।  उनके बारे में कोई गुफ़्तगू नहीं हो सकती।

ओलम्प डी गोज़ , मेरी वूल साईं क्राफ़्ट, फ़्लोर ट्री स्तान सोज़ोरनर ट्रुथ के नाम हमारे यहां भी कुछ दिनों से लिए जा रहे हैं। एक खास क्षेत्र भर में। वर्जीनिया वुल्फ की तरह अगर मैं भी सवाल उठाऊँ कि पिछले चार-पांच हजार वर्षों में क्या सिर्फ इतनी ही महान औरतें गुजरी हैं तो यह सवाल कुछ बेजा ना होगा... उन तमाम औरतों की जिंदगी का हिसाब कौन देगा, जो दिमाग रखती थीं , सोचती थीं , महसूस करती थीं। क्या वे सिर्फ़ इसलिए पैदा हुई थीं ,  कि विश्व के विभिन्न समाजों में खाद के तौर पर इस्तेमाल हो जाएँ। क्या उनमें से पाँच-दस हज़ार भी इस क़ाबिल न थीं कि इतिहास में अपने काम और अपने नाम से जिंदा रह सके?''

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''हर कौम ने अपनी औरत को कभी ख़ुदा का वास्ता दिया तो कभी दुनियादारी का। ख़ुदा और दुनियादारी की आड़ में उसके हक़ मारे जाते रहे। कभी उसे आसमानी हवाओं से बहकाया गया तो कभी जमीनी संहिताओं में दर्ज़ बर्बर  नियम-कानून उसे दहला गए। स्त्री अपने बर्दाश्त की हद बढ़ाती रही , जुल्म भी बढ़ते रहे । फ़िर धीरे-धीरे वक़्त बदला। जमाने की बदलती हुई हवाओं ने औरत पर भी असर डाला। उसके जेहन पर पड़ी हुई सदियों की गर्द हवा के झोकों से कुछ तो अपने आप उड़ी और कुछ औरतों ने उसे साफ करने के ख़ुद हाथ-पाँव मारे। उसने मन में दबे हुए सवालों को आवाज़ देनी शुरू की। उसके जेहन में एक सौ ख्याल और उनकी बाबत एक हज़ार सवाल पैदा हुए।  इन ख्यालों और सवालों से सूरत-हाल कुछ तो बदला लेकिन बहुत कुछ अभी बदलना बाकी है। इस बदलाव की हर औरत शिद्दत से आस लगाए बैठी है। फ़िर वो पाकिस्तान की हो या हिंदुस्तान की। ईरान की हो या इंगलिस्तान की।''


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''आदम और हव्वा का किस्सा हम जानते ही हैं। दरअसल, इस दूर तक फैली जमीन पर सारी रौनक हव्वा के दम से है , वरना आदम का इरादा तो यह था कि ख़ुदा के बंदे ख़ुदा के हर हुक्म पर सर झुकाते हुए बाग-ए-अदन यानी 'जन्नत के बाग' में जिन्दगी कभी न खत्म होनेवाले समय तक गुजार दें। यह हव्वा थी जिसके अंदर जिज्ञासा थी , जिसने साँप के रूप में आनेवाले इब्लीस (शैतान) से संवाद किया। अच्छे-बुरे की पहचान करानेवाले पेड़ का फल खुद खाया और आदम को भी खिलाया। लेकिन जमीन पर  कदम रखते ही उसकी किस्मत बदल गयी।''

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आदम और हव्वा का ये किस्सा मिथक जरूर है पर इस सवाल को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता कि साथ-साथ शुरू होने वाले सफ़र में औरत क्यों बराबर पीछे छूटती गई। ऐसा क्यों हुआ? यह गहन शोध का विषय है।

सालाना परिक्रमा पूरी कर हम एक बार फिर 08 मार्च की 'सरहद' पर जा पहुंचे हैं। साल दर साल यही दिखता है की स्त्री के सामाजिक रुतबे और रूआब में कोई खास फर्क़ नहीं आया। बेहद संजीदगी से भी पैमाइश की जाए तो कोई बाल बराबर फर्क़ ही दिखेगा। खैर! यह बाल बराबर फर्क़ भी साल दर साल पड़ता रहे तो औरतों के हिस्से कुछ राहत और सुकून आए। 

पूरी दुनिया में  स्त्रियों की सामाजिक हैसियत दूसरे पायदान पर ही ठहरती है। जिंदगी के जिंदा में सांस लेती हुई औरत की दास्तान ए रायगानी  है ज़ाहिदा हिना की तफ्सील। 

जॉन एलिया को तो आप पढ़ते ही हैं ज़ाहिदा को भी पढ़ें..


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*पुस्तक : 'औरत जिंदगी का जिन्दां'

(नोट - 'पाकिस्तानी स्त्री : यातना और संघर्ष '  ज़ाहिदा हिना की उर्दू में प्रकाशित पुस्तक  'औरत जिंदगी का जिन्दां' का हिंदी अनुवाद है। अनुवाद शक़ील सिद्दीकी ने किया है। पुस्तक में अलग-अलग अवसरों पर लिखे गए सात निबंधों का संकलन है। निबंध विशेष रूप से  मुसलमान स्त्री के त्रासद और कठिन संघर्ष से संबंधित हैं। हिंदी में इसे वाणी प्रकाशन , दिल्ली ने प्रकाशित किया है।)


____________नीलिमा

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