▪️दुनिया में औरत : 16
सौंदर्य बनाम शारीरिक विरूपता
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स्त्री के शरीर और चेहरे को विरूप करने के अनेक उदाहरण विभिन्न देश-काल से मौजूद हैं जो यह बताते हैं कि किस तरह से लंबे समय से समाज में स्त्रियों को विरूपता को अंगीकार करने के लिए बाध्य किया गया है। शारीरिक विरुपता के जबरन अंगीकार करवाए जाने के तमाम सन्दर्भ हमें इतिहास से मिलते हैं और कुछ ऐसे भी हैं जो वर्तमान में हमारे आसपास उपलब्ध हैं।
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लोटस फीट का प्रचलन चीन में था। इसमें पैरों को बाँध कर उनका स्वाभाविक विकास अवरुद्ध किया जाता था। चीन में दो पीढ़ियों की स्त्रियां इस परंपरा से आक्रांत रहीं। लोटस फीट की चीनी परम्परा को ढूंढने के लिए शिद्दत से इतिहास खंगालने की जरूरत नहीं पड़ती। चीन की ये परम्परा जग- ज़ाहिर है। इसके अनेक ऐतिहासिक संदर्भ मौजूद हैं। चीनी पितृसत्तात्मक समाज के द्वारा स्त्रियों के बीच छोटे पैर की यह अवधारणा आकर्षण के तिलिस्म में लपेटकर प्रस्तुत की गई थी । परंपरा से स्त्री के आकर्षण की परिणिति पुरुष की लोलुप दृष्टि में होती आई है।
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लोटस फीट से जुड़ा क़िस्सा मुझे पहली बार मेरी दादी ने सुनाया था। पूरा विस्तार और संदर्भ तो अब याद नहीं। बस इतना याद है कि , 'सर बड़ा सरदार का , पैर बड़ा गंवार का' एक कहावत प्रचलित थी। उससे जुड़ी मेरी उत्सुकता के शमन के लिए दादी ने हमें चीनी स्त्रियों की कहानी सुनाई थी। कहावत में सरदार और गंवार शब्द सामाजिक प्रतिष्ठा सूचक संदर्भ में इस्तेमाल किए गए हैं।
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चीन के समाज में छोटे पैरों से जुड़े हुए आकर्षण की अवधारणा का विकास कब कैसे और क्यों हुआ इसके तमाम ऐतिहासिक संदर्भ दस्तावेज़ो में मिलते हैं । चीनी समाज में इन्हें लम्बे समय तक भावी दुल्हन के 'सर्वाधिक आकर्षक गुण' के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा।
दुल्हन की 'विशिष्ट शारिरिक गुणवत्ता' होने के साथ-साथ इस परम्परा के अन्य अनेक सामाजिक निहितार्थ भी थे। बंधे हुए पैर चलने-फिरने में असुविधाजनक थे। बिना किसी प्रयास के ये लड़कियों को घर की चौहद्दी के भीतर ठेल देते थे। मंशा यह थी कि घर में रहकर वे घर-गृहस्थी के काम-काज में दक्ष हों। घरेलू काम-काज में दक्षता पुरातन काल से पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री की विशिष्टता और अतिरिक्त योग्यता बताई जाती रही है। किन्तु वास्तव में यह योग्यता कम उनके ऊपर आरोपित बाध्यता अधिक रही है।
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इस तरह जबरन पैर के प्राकृतिक विकास को अवरूद्ध किए जाने से पैरों में विकृत आनी स्वभाविक थी। यह एक क़िस्म से शरीर पर आरोपित की गई क्रूरता थी जिसका ख़्मयाज़ा स्त्रियां जीवन भर भुगतती थीं। बंधे हुए पैरों में दर्द तो होता ही था साथ ही साथ ख़ून के प्रवाह (रक्त संचार ) के अवरुद्ध हो जाने से उनकी हड्डियां कमजोर हो जाती थी और स्नायु तंत्र की पकड़ क्रमशः ढीली पड़ जाती थी ।
कई बार उन्हें गैंग्रीन (कोथ ) जैसी बीमारी से भी गुज़रना पड़ता था। विरूपित पैर न सिर्फ़ देखने में अनाकर्षक और भद्दे दिखते थे सामान्य चाल को भी प्रभावित करते थे। इस तरह का क्रूर और ख़ुराफ़ाती विचार जिस भी मानव मस्तिष्क में पहली बार उपजा हो उसकी व्यक्तिगत कुंठा और स्त्री-द्वेष अपरिमेय है।
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चीन की यह परंपरा जिसे आज हम 'लोटस फीट' के नाम से जानते हैं आज की तारीख़ में रिकॉर्डेड हिस्ट्री का हिस्सा बन गई है । इससे जुड़े पर्याप्त ऐतिहासिक-पुरातात्विक संदर्भ और उनका विश्लेषण हमें उपलब्ध है।
एक समय में चीनी समाज की स्त्रियों के छोटे पैर से जुड़ी सनक की पर्याप्त चर्चा रही है और ज़्यादातर लोग उससे वाकिफ़ भी है। सन 1912 ईस्वी में यह प्रथा प्रतिबंधित कर दी गयी थी।
______________नीलिमा
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