▪️दुनिया में औरत : 08
'तुम्हारे नाम' में दर्ज ख़त सिलसिलेवार ढंग से 01 अक्टूबर ,1943 से शुरू होकर 29 दिसंबर ,1952 के बीच लिखे गए हैं। इन खतों पर लखनऊ ,भोपाल और अलीगढ़ के नाम दर्ज़ हैं। आख़िरी ख़त लखनऊ से है , और पहला भी । 'तुम्हारे नाम' को जब पहली बार हाथ में थामा तो निगाह ख़त शब्द से उलझ गई। एकबारगी लगा के यूँ किसी के ख़त कैसे पढ़े जा सकते हैं ? साथ ही यह ख़्याल भी ज़ेहन में उठा कि सफ़िया को अपने अख़्तर को लिखे गए खतों का यूँ सरेआम पढ़ा जाना कैसा लगता ? क्या वो इजाजत देतीं ?
उर्दू की रोशनाई में डूबे यह ख़त मोहब्बत की बयार से ताजा दम हैं। सन '52 का लिखा आख़िरी ख़त कुछ महीनों में 70 बरस की उम्र हासिल कर लेगा , पहला तो 79 बरस का हुआ। इन्हें पढ़ते हुए दर्द की शहनाई बराबर बजती रही। तन्हा मुहब्बत का ये दस्तावेज पढ़ते हुए मीर याद हो आए :
"दिल मुझे उस गली में ले जा कर
और भी ख़ाक में मिला लाया.."
सफ़िया अख़्तर के दिल की अक़्क़ाशी समझिए इन्हें ।
★★★
" जाने अज़ीज़
कैसे हो ? मेरे कूच के वक्त मेरी तबियत पर जो बार था उसकी फ़िक्र है। खुदा करे अच्छी तरह सो गए हो और सुब्ह बश्शाश (खुश) उठे हो।
इस मर्तबा ग्वालियर के स्टेशन पर हर लहज़ा (क्षण) दिल चाहता था कि काश कोई खारजी कुव्वत (बाह्य शक्ति) जाने से रोक लेती और अपने पर से जिम्मेदारी का बोझ हट जाता, मगर संग-दिल ट्रेन आकर रही और बेरहम लोगों ने टिकट भी हासिल कर लिया और सफ़िया को दूर फेंक दिया, गो कि वो इसके बावजूद तुमसे ज़रा भी दूर नहीं।
जब सोचती हूं तो समझ में नहीं आता कि मेरी गैरमौजूदगी में ज़िन्दगी को किन मशागिल (कामों) से पुर करते होगे ? फातिमा बहन बेचारी मजदूर आदमी, वक्त पर चल देती होगी, फिर घर पर अकेले क्या करते होगे, वक्त कैसे कटता होगा ? घबराओ नहीं, मैं भी तुम्हारे पास हूं, अलबत्ता ये और बात है कि ऐसे में मीना (शराब ) भी आ जाती हो और मुझे उस बज़्म से निकाला मिल जाता हो।
तुम कब आओगे ? मुझे बुलाना या ख़ुद आना। मार्च के पहले हफ्ते में जयपुर जाना तय करो और मुनासिब समझो तो मुझे भी ले चलो। औन के यहां ठहरेंगे और उनकी शाने-मेज़बानी भी देखेंगे। वैसे तुम अपनी मर्ज़ी पर रखो। ये शौक तो महज़ तुम्हारी हमसफरी की ख्वाहिश में उछला बकिया कुछ नहीं। खैर।
हां, और सुनो। आज यूनिवर्सिटी बंद रही। कोई तालिबेइल्म इत्तेफाकिया रेल से कुचलकर मर गया था रात को। तबियत पर तकद्दुर (उदासी) सा रहा गो कि मौसम बहुत ही रंगीन रहा।
आज दोपहर कोई तीन घंटे सोई। ये नींद गोया वो क़र्ज़ मयसूद ( ब्याज सहित ऋण) है जो तुम्हारे पहलू और बाजुओं पर वाजिब था।
आज एक बहुत ही 'देर हज्म' किस्म की किताब पढ़ने के लिए उठाई है। अपने को तुमसे बहस करने के लिए मुसल्लह (तैयार) करना चाहती हूं। लड़ने के लिए तो मेरी फितरत ने मुझे मुसल्लह करके भेजा था पर बहस की ज़रूरत यूं आन पड़ी तुमसे लड़े बगैर बहस छिड़े, मुमकिन ही नहीं है।
तुम्हारी सलाहकार नहीं बनना चाहती। बनूं भी क्योंकर और दावा भी करूं तो किस बिरते (आधार) पर जबकि अपने को बेशतर चीज़ों में तुमसे कमतर पाती हूं। हां, छेड़ की खातिर फिर लिख रही हूं कि मेरे पीछे मुझ से 'तर्के वफ़ा' न बरतना कि अपने को मुझसे अलेहदा करके ख़ुद परेशानियों के दौरे डालो और कहो कि मैं सफिया के साथ ये न कर सका और ये न कर सका।
यकीन करो अख्तर कि ये एहसास ही मेरी ज़िन्दगी के अक्सर लम्हों को कतई सुकून बख्श देता है कि मैं तुम्हारी हूं। अब तक मैं किसी कि भी न थी और न समझ सकती थी कि अपने को क्योंकर संभालकर रखूं और किसके लिए ? मेरी वफाओं का, मेरी उबलती हुई आरजुओं और तमन्नाओं का मर्कज़ कोई नहीं था। मेरे ख्वाबों का पसमंज़र (परिदृश्य) बिल्कुल सियाह था और मेरे अरमानों की दुनिया यकसर ( बिलकुल) सूनी।
ऐसी उजड़ी हुई दुनिया को एकाऐकी जगमगा देने का सेहरा तुम्हारे सर होगा, इसका यकीन भी न था। पिछली बातें ऐसी पिछली बातें बन चुकी हैं कि उनके हकीकी ( सच) होने में भी शुब्ह (शक) है। फिर ऐसे में भी तुम ये करते हो कि मेरे पीछे मेरी इसे दुनिया को ठुकराकर उस दुनिया में जा बसते हो जो तुम्हारे लिए गुजरी बात बन चुकी है और फिर अक्सर ऐसी बातों पर मग्मूम ( दुखी) होते हो जिन पर ग़म करने का अब तुम्हें कोई हक नहीं रहा मेरे दोस्त !
आओ, प्यार कर लूं तुम्हें। न मालूम किन नज़रों से इन सतरों को पढ़ रहे हो। इस तसव्वुर को ज्यादा मज़बूत नहीं करना चाहती वरना मेरे हाथ थरथराने शुरू होंगे शिद्दते-ज़ज्बात से और फिर मुझसे कुछ भी तो न लिखा जाएगा।
तुमसे मिलने को हर मिनट जी चाहता है। इस ज़ब्ते-नफ़्स (भावना पर नियंत्रण) का कुछ सवाब भी है या नहीं, ये तुम बताना। हां सुनो ! इस जुमे को सलमा देहली जा रही हैं, सईदा भी। सलमा को कपड़े खरीदने हैं, दुल्हन बनने के लिए। मेरी राय और मेरा इंतेखाब ( चुनाव) बहुत अहम् है इस मुआमले में, चुनांचे मुझे साथ ले जा रही हैं, चली जाऊं ? तुम्हारी आपा शाहिदा से भी मुलाकात होगी, तुम्हारे मजाज़ से भी।
मुझे मुफस्सिल सा ख़त लिखना। महज़ प्यार की बातें लिखकर टाल देते हो मुझे। ये भी लिखना कि कैसे रहते हो और क्या करते हो ?
देहली से क्या मंगाते हो अपने लिए ? न बताओ मैं ख़ुद ही अपनी मर्ज़ी से ले आउंगी उलटी-सीधी चीज़ें, फिर उन्हें बरतना ही पड़ेगा तुम्हें।
आओ मेरे करीब , प्यार कर लूं तुम्हें। शब बखैर..
- तुम्हारी सफ्फो "
( 22-02-1944 , अलीगढ़ से लिखा गया)
★★★
क्या तो ख़त है और क्या लहजा। उर्दू नस्र का नायाब नमूना। सफ़िया की मशहूरी मजाज़ और जां निसार अख़्तर की वजह से अधिक रही। उनके ख़तों का संकलन पढ़ते हुए उनका ये तआरुफ़ बेमजा लगा। अदीबों की दुनिया में उनको यूँ आम क्यों समझा गया कहना मुश्किल है। कथाकार-नाटककार असगर वजाहत ने कुछ अरसा पहले 'तुम्हारे नाम' शीर्षक से उनके ख़तों का लिप्यंतरण किया था। राजकमल ने प्रकाशित किया है। उर्दू से गुरेज़ न हो तो एक दफ़ा पढ़ जाइये। आप भी मुतमईन होंगे कि मजाज़ की बहन और जांनिसार अख़्तर की पत्नी होने के साथ ही वह एक शानदार सृजक भी थीं। मुहब्बत की ओस में नम ये ख़त पढ़ते वक़्त आवाज़ में कशिश और आँखों नमी उतर आती है। ख़तों का संकलन दो जिल्दों में सफ़िया अख़्तर के निधन के बाद हर्फ़े आशना और ज़ेरे-लब नाम से छपा। 'तुम्हारे नाम' में दोनों जिल्दों के ख़तों को शामिल किया गया है।
________नीलिमा
तस्वीर : साफ़िया अख़्तर
(तुम्हारे नाम /सफ़िया अख़्तर /2020/राजकमल प्रकाशन , नई दिल्ली/पृ.181)
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