▪️दुनिया में औरत : 07
एक थीं 'छप्पन छुरी'
_
'सइयां निकस गए मैं न लड़ी थी, न जाने कौन सी खिड़की खुली थी'..
कबीरदास जी का रचा भजन है। कबीर रहस्यवाद के पुरोधा हैं। मिट्टी के चोले से आत्मा को इस अंदाज़ में विदा देते हैं। जानकी बाई अपनी आवाज़ में जब इसे गाती थीं तो दरबारी महफ़िल ठुमक उठती थी और यह ठुमरी का अंदाज ले लेता था। उनकी आवाज़ बुलंद थी, मक़ाम भी उन्होंने बुलंद ही पाया। गायकी के ख़ास अंदाज़ से उनका नाम हिंदुस्तान की शुरुआती रिकार्ड की गई आवाज़ों की फ़ेहरिस्त में शामिल हुआ।
जानकी बाई की पैदाइश बनारस (1880 ईसवी) की थी। पिता शिवबालक राम अखाड़े के पहलवान थे तो माँ मनकी संगीत की समझ रखने वाली रुचि सम्पन्न महिला। चंद रोज के ख़ुशनुमा बचपन के बाद उनके पिता ने माँ-बेटी से मुँह मोड़ लिया। मज़बूरन मनकी देवी ने अपना बनारस का घर बेच इलाहाबाद बसने का फैसला किया। उस वक़्त मदद देने के लिए जो हाथ बढ़ा वह भी स्वार्थ की चाशनी में डूबा हुआ था। मदद का स्वांग करने वाली एक स्त्री माँ-बेटी को एक कोठे के सुपुर्द कर चलती बनी। नसीब ने पहलू बदला और यहीं से जानकी बाई का शोहरत हासिल करने का सिलसिला शुरू हुआ।
संगीत की शिक्षा उन्होंने लखनऊ के हस्सू खान जी से हासिल की। गुरु की निगहबानी में उन्होंने अपने सुर को इस कदर साधा कि उनकी गिनती अपने समय की नामचीन गायिकाओं में होने लगी। उनकी शोहरत का अंदाज़ा इस बात से लगता है कि जार्ज पंचम की ताजपोशी (1910 ईसवी) के वक़्त उन्हें गौहर जान के साथ युगल गीत प्रस्तुत करने के लिए चुना गया। उनके युगल गान पर खुश होकर जार्ज पंचम के द्वारा सौ गिन्नियां भेंट करने का ज़िक्र दस्तावेज़ो में है।
जानकी बाई महफ़िलों में गाती ज़रूर थीं लेकिन ज़्यादातर पर्दे से गाती थीं। एक दफ़े रीवा के महाराजा ने उनके दीदार की इच्छा जाहिर की तो उन्होंने सुर,साज़ और सीरत के हवाले से अपनी सूरत को बेपर्दा करने से सलीके से इनकार कर दिया। उनकी पर्देदारी से जुड़े कुछ क़िस्से मिलते हैं। कहते हैं कि किसी नाकामयाब सिरफिरे आशिक़ ने जुनून में उनके चेहरे को छप्पन दफ़े छुरी से गोद दिया था। इसी वजह से छप्पन - छुरी विशेषण उनके नाम से जुड़ गया। इस वाक़ये के समय उनकी उम्र बारह बरस बताई जाती है। आशिक का नाम रघुनंदन मिलता है जो पुलिस महकमें का मुलाज़िम था। कुछ जगहों पर ये क़िस्सा उनकी सौतेली माँ के हवाले से दर्ज है। तवायफ़ के पेशे के साथ जुड़े ख़ूबसूरती के स्टीरियोटाइप ने उन्हें मजबूर किया कि वह अपने हुनर और दिलकश आवाज़ को पर्दे से शाया करें।
संगीत की तालीम के साथ-साथ जानकी बाई ने अंग्रेजी,संस्कृत और फ़ारसी की शिक्षा भी हासिल की थी। खतो-किताबत कर लेती थीं। उनका एक दीवान (दीवान-ए-जानकी) भी मिलता है। ख़तो-किताबत की बात निकली है तो एक वाक़या दर्ज़ करते चलें। सन 1911 का बरस इलाहाबाद के इतिहास में एक घटनापूर्ण बरस था। जनवरी से शहर महाकुम्भ की रौनक में डूबा था। पूरा हिंदुस्तान मानो इलाहाबाद में इकठ्ठा हुआ जाता था। फ़रवरी में शहर एक दूसरे जलसे की राह देख रहा था। जलसा भी क्या इतिहास में दर्ज़ होने वाली तारीख़ थी। अंग्रेजी हुकूमत की तरफ से यूनाइटेड प्रोविंस में एक औद्योगिक मेले का आयोजन किया गया था। इसी के तहत 18 फरवरी,1911 को हेनरी पिकेट दो सीटर बाई-प्लेन उड़ाने वाले थे। यह एक प्रतीकात्मक उड़ान थी जो दुनिया की पहली ऑफिशियल एयर मेल (First Aerial Post) लेकर जाने वाली थी। ज़ाहिरन सरकार की तरफ से इसका ख़ूब प्रचार हुआ था। तमाम दूसरे लोगों की तरह जानकी बाई ने भी इस ऐतिहासिक मौके पर तीन ख़त लिख छोड़े थे।
जलालत और अक़ीदत के बीच ज़िन्दगी गुज़ारते हुए जानकी बाई सन 1934 में इलाहाबाद के काला डंडा कब्रिस्तान में सुपुर्दे ख़ाक हुईं। आज भी इलाहाबाद के आदर्श नगर इलाके में जीर्ण-शीर्ण पड़ती उनकी क़ब्र देखी जा सकती है। छप्पन छुरी का तमगा यहाँ भी उनके साथ है। लिखा मिलता है : 'छप्पन छुरी की मज़ार' ।
बीसवीं शताब्दी की दरबारी महफ़िलों की रौनक रही तवायफ़ों की शास्त्रीय संगीत को लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उनसे जुड़े किस्से संगीत की परंपरा से ही निसृत हैं जो पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तान्तरित हुए। कुछ क़िस्से लिखे मिलते है जो तवायफ़ों की खुद की क़लम से हैं, कुछ मौखिक परंपरा से आये हैं। इनमें से कुछ आवाज़ बनकर महफूज़ हो गईं बाक़ी ग़र्क़ हुईं। आवाज़ ही इनकी पहचान है। आवाज़ जिसमें खनक है, मिठास है जो बारहा उदास है..
__________________नीलिमा
तस्वीर:जानकी बाई
#womenaroundtheworld
#singer #semiclassical
#स्त्री_07

Comments
Post a Comment