▪️दुनिया में औरत : 04

 सौंदर्य बनाम शारीरिक विरूपता के अनेक उदाहरण जनजातियों से मिलते हैं।

जनजातियों में प्रचलित इन  कु-प्रथाओं का दस्तावेज़ीकरण तुलनात्मक रूप से बेहद सीमित स्तर पर हुआ है। इस सिलसिले में बर्मा की एक जनजाति क्यान/कयान का संदर्भ उल्लेखनीय है। कयान तिब्बती-बर्मन मूल का अल्पसंख्यक वर्ग है। इन्हें 'पदउँग' के नाम से भी पुकारा जाता है। हालांकि इन्हें यह संबोधन रुचिकर नहीं लगता है। बहरहाल यहां हम सिर्फ एक संदर्भ में कयान जनजाति से मुख़ातिब हैं। 


इस जनजाति की स्त्रियों की गर्दन में पीतल के छल्ले (कुंडल/coil) पहनने का रिवाज़ है। ऐसा गर्दन को लंबा और सुतवां दिखाने के लिए किया जाता है। भारतीय साहित्य से भी हमें सुराहीदार लम्बी ग्रीवा के तमाम उल्लेख , संदर्भ और रूपक मिलते हैं। पतली-लम्बी गर्दन स्त्री की शारिरिक सुंदरता में इज़ाफ़ा करती है , ऐसी आम राय है।

कयान जनजाति की इस प्रथा के मूल में भी वही चिरंतन आदिम इच्छा है ,  'स्त्री का खूबसूरत दिखना'। इस जनजाति में 05 बरस की उम्र से ही लड़कियों की गर्दन पीतल के  छल्लों से बांधी जाने लगती है। समय बीतने के साथ छल्लों के वजन से कॉलर बोन और रिब केज पर असर पड़ता है। नतीजन  छल्ले पहनने वाली स्त्रियों का क्लेविकल डिफॉर्म हो जाता है जिससे उनके शरीर में अनेक स्वास्थ्यगत समस्यायें पैदा होती हैं। क्लेविकल की विरूपता उनके स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डालती है।

एक बार पहने गए  इन छल्लों को उतारने का कोई रिवाज़ नहीं है। केवल उम्र बढ़ने के साथ नये  छल्ले डालने के लिए ही उन्हें गर्दन से निकाला जाता है। अन्यथा स्त्रियां इन पीतल के छल्लों को निरंतरता में  पहने रहने के लिए बाध्य होती हैं। 

ज़ाहिर है इस सारी प्रक्रिया से गर्दन किसी सूरत लंबी नहीं होती। क्लेविकल की विरूपता उसे खिंचा हुआ दर्शाती जरूर है। लगातार छल्ले धारण करने की वजह से गर्दन की त्वचा बदरंग हो जाती है और मांसपेशियां कमजोर पड़ जाती हैं। छल्लों की रगड़ से कुछ चोटिल , धूप के अभाव में बदरंग गर्दन को छिपाने कोशिश में समझ आने के बावजूद स्त्रियां  बेहतर , सुंदर और आकर्षक दिखने की चाह में बराबर छल्ले पहने रहती हैं । 

कयान जनजाति की स्त्रियों में गर्दन को पीतल के छल्लों से घेर देने की परंपरा लैंगिक विभेद की अतिशयोक्ति को दर्शाती है। उनके समाज की स्त्रियों से बात करने पर जो वजहें सामने आती हैं उनमें सुंदरता का सन्दर्भ तो है ही साथ ही साथ उसे सांस्कृतिक पहचान से भी जोड़ा गया है। 

जो अन्य कारण बताए गए हैं बताए जाते हैं उनमें स्त्रियों को अन्य जनजातियों के पुरुषों की कु-दृष्टि से बचाना , उन्हें बंधक या गुलाम बनाए जाने से बचाना वगैरह शामिल हैं।  कुछ संदर्भों में यह भी कहा गया है कि गर्दन में पहने हुए छल्लों से स्त्रियां "ड्रैगन" जैसी दिखती हैं। उल्लेखनीय है कि  कयान जनजाति के लोक-विश्वास में ड्रैगन महत्वपूर्ण स्थान रखता है। 

वज़ह जो भी बताई जाएं सवाल ये है कि इस तरह की   रूढ़ियाँ जिनके विश्लेषण में विशिष्टता बोध को सर्वोपरि रखा जाता है उन्हें जनजातिय पुरुषों पर क्यों नहीं आरोपित किया गया। बहरहाल यह स्पष्ट है कि स्त्रियों को एक निर्धारित 'परिधि' में सीमित कर देने की परंपरा पूरे विश्व से सामाजिक विकास के विभिन्न चरणों में एकरूपता से (यूनीफामर्ली) मिलती है। जनजातीय समाज , ग्रामीण समाज , शहरी समाज , सभ्य समाज , अभिजात्य वर्ग , मध्यमवर्ग , निम्न वर्ग किसी किनारे से तफ़्तीश कर लीजिए स्त्रियों का पायदान हमेशा पुरुषों के बरक्स न सिर्फ़ दूसरा मिलेगा बल्कि तमाम रूढ़ियों और चौहद्दियों से चाक-चौबंद भी होगा।

कयान स्त्रियों में पीतल के छल्ले धारण करने की यह प्रथा आज भी जारी है।


________________नीलिमा

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