♦️लखनऊ के गिरजाघर : 03
♦️लखनऊ के गिरजाघर : 03
नवाबों की मिल्कियत के दौर में अवध सूबे की अपनी शान थी। राजधानी लखनऊ इस शान में चार चांद लगाती थी । लखनऊ में भी ईसाइयों की धार्मिक जरूरत का ख्याल रखते हुई गिरजे बने। शुरुआती बने गिरजों की न तो कोई तस्वीर मिलती है न ही उनका ढांचा बचा है कि उनके रंग - रूप की तामीर की जा सके।
इतिहास में दर्ज है कि लख़नऊ रेजीडेंसी के परिसर में एक गिरजाघर स्थित था जिसे सेंट मेरीज़ चर्च कहा गया है। ऐतिहासिक रूप से इसे हिंदुस्तान में स्थापित किये गए चर्चों में तीसरे क्रम पर रखा जा सकता है। पहले दो चर्च क्रमशः चेन्नई (1660) और कोलकाता (1770) में बने। इस तरह से रेजीडेंसी में स्थित सेंट मेरीज़ चर्च हिंदुस्तान का तीसरा और उत्तर भारत का पहला चर्च बन जाता है।
लख़नऊ पर लिखे गए दस्तावेजों में इस चर्च के 1837 के पहले उपस्थित होने की संभावना से इंकार किया गया है। इसके बनाये जाने की अनुमानित तिथि सन1845 ईसवी के बाद रखी जाती है।1845 ईसवी के बाद इसे यूरोपीय समुदाय की धार्मिक अभिव्यक्ति एवं संतुष्टि के दृष्टिगत बनवाया गया। दस्तावेजों में दर्ज़ है कि गोथिक शैली में बना यह चर्च चारदीवारी से घिरा हुआ था।
इसमें चारो तरफ़ लगे छायादार वृक्ष इसे आकर्षक और सुकून भरी जगह बनाते थे। चर्च की क्षमता एक समय में 130 व्यक्तियों की बताई गई है।शुरुआत में चर्च के साथ कोई कब्रिस्तान नहीं था। सन 1857-58 ईसवी की गदर के समय हुई घेराबंदी के दौरान चर्च परिसर में मृतकों को पहलीबार दफ़न किया गया। पाँच महीने तक चलने वाली घेराबंदी में रेजीडेंसी की तमाम दूसरी इमारतों की तरह सेंट मेरीज़ चर्च भी बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गया। सिर्फ़ दो चार फुट ऊंची दीवारें और दफ़न किये लोगों की कब्र शेष बचीं।इन्हें आज भी देखा जा सकता है।
इन कब्रों में ज़्यादातर वही लोग दफ़न हैं जो 18757-58 में फैली मार-काट के दौरान रेजीडेंसी की रक्षा करते हुए मारे गए।उनकी क़ब्रों के साथ स्मारक पत्थर जड़े हुए हैं। कुछ क़ब्रें ऐसे लोगों की भी हैं जो इस दौरान बीमारी से या गोलाबारी की चपेट में आ जाने से मारे गए।यहाँ अंग्रेज अफसरों, सैनिकों,के अलावा औरतों और बच्चों के शव भी दफ़न हैं।रेजीडेंसी का यह गिरजाघर पूरब से पश्चिम की ओर उतरते हुए ढलान पर स्थित है।
इसकी एक दीवार में चर्च शब्द खुदा हुआ है जिसे आज भी देखा जा सकता है और जिसका होना इस खन्डहर के कभी चर्च होने की तस्दीक करता है। ऐतिहासिक रूप से चर्च की पूर्वी दीवार पर जड़ा हुआ एक पत्थर महत्वपूर्ण है।पत्थर पर दर्ज़ है ,
'This breach was made in order that the grain stored in the Church might be removed into the residency.'
सन 1857 ईसवी की क्रांति के दौरानचर्च के इस हिस्से में रसद का भंडारण किया गया था। बाद में चर्च पर हमले बढ़ जाने से और उसके दिन पर दिन असुरक्षित होते जाने की स्थिति में पूरब वाली दीवार को तोड़कर उससे अनाज निकाला गया। यही बात पत्थर पर दर्ज़ है। बात बहुत सामान्य और छोटी सी है लेकिन वक़्त के गुज़र जाने के साथ एक महत्त्वपूर्ण पुरातात्विक दस्तावेज की भूमिका में हमारे सामने है।
_____________नीलिमा




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