▪️दुनिया में औरत : 03

 भारत में पूर्वोत्तर में बसने वाली एक जनजाति है अपतानी।  कभी-कभी इन्हें तानी भी कह दिया जाता है। अपतानी मुख्य रूप से अरुणाचल प्रदेश की जीरो वैली (सुबनसिरी जिला) में निवास करते हैं। तमाम जनजातियों की तरह तानियों में भी  स्त्रियों के शरीर पर गोदना गोदवाने का रिवाज़ है। इसके मूल में जो बात है वह उतनी ख़ूबसूरत और चमकदार नहीं है जो फैशनपरस्ती की आड़ में टैटू शब्द के इर्द-गिर्द जमा दिखती है। 


तानी औरतें किसी साज-सज्जा या अलंकरण के तहत टैटू नहीं करवाती हैं। गोदना उनके लिए अपनी खूबसूरती को ढकने का माध्यम है । उनके समाज में परंपरा से यह माना जाता है कि कबीलाई झगड़ों में दुश्मन बने दूसरे जनजातीय कबीले के पुरुष ख़ूबसूरत तानी स्त्रियों का अपहरण कर लेते थे। इस मुश्किल से बचने के लिए बुज़ुर्गों की पंचायत ने एक फ़रमान जारी किया। तय किया गया कि लड़कियां यौवन की दहलीज पर कदम रखते ही सायास ऐसे तरीके अपनाएं जिससे उनका चेहरा अनाकर्षक और भद्दा दिखे। इसके लिए दस बरस की उम्र तय की गई और दो तरीके निकाले गए ।

पहला गोदने से चेहरे को बदसूरत बनाना और दूसरा नाक में एक भारी-भरकम आभूषण धारण करना। लकड़ी से बने आभूषण को नोज प्लग कहा गया है। 

स्थानीय भाषा में तानी लोग नोज प्लग को यापिंग हुल्लू (Yaping Hullo) कहते हैं। इसे जंगल में उपलब्ध लकड़ी से बनाया जाता है। इस बात का ख़याल रखा जाता है की लकड़ी के टुकड़े को नाक में दोनों तरफ जड़ने से पहले उसे भली-भांति सैनिटाइज कर लिया जाए । जिससे नाक की त्वचा में किसी किस्म का संक्रमण ना हो। 

गोदना बनाने के लिए चिमनी की राख से बनी कालिख़ और सूअर की चर्बी का इस्तेमाल किया जाता है। इनसे तैयार रंग से चेहरे  पर लकीरें बना कर उसे बदसूरत किया जाता है। गोदने को तानी लोग स्थानीय भाषा मे टिप्पई कहते हैं । 

नाक में जड़ा गया लकड़ी का टुकड़ा नाक को फैला कर विरूप कर देता है । जिससे चेहरे का सहज स्त्रियोचित आकर्षण खो जाता है। लंबे समय से अपनाई जाने वाली यह परंपरा तानी जनजाति की स्त्रियों की पहचान बन गई है। नाक नुकीली ही सुंदर मानी जाती है। 'पकौड़े जैसी नाक' चौड़ी या फैली हुई नाक के लिए इस्तेमाल होने वाला नकारात्मक रूपक है। ज़ाहिर है चेहरे पर खींची गई आड़ी -तिरछी काली/नीली लकीरें और चपटी नाक स्त्रियों के चेहरे की स्निग्धता और लावण्य को कम करने के पितृवंशीय तानी समाज के हथियार थे। 

ख़ास बात यह है कि बुज़ुर्ग स्त्रियों में इन प्रथाओं को थोपे जाने को लेकर कोई गुरेज़ नहीं है। इतिहास गवाह है कि स्त्रियां आदिकाल से तमाम कुरीतियों और परंपराओं की कट्टर वाहक रही हैं। बुज़ुर्ग तानी स्त्रियां भी इन दोनों प्रथाओं को 'फेदर इन कैप' की तरह प्रस्तुत करती हैं। इनको अपनाने में और उनका प्रदर्शन करने में उन्हें गौरव की अनुभूति होती है।

बहरहाल सन 1970 में नोज प्लग को सरकार की तरफ से प्रतिबंधित कर दिया गया। यही वजह है कि 45 साला या उससे अधिक उम्र की तानी स्त्रियों के इतर कम उम्र की लड़कियां अब नोज प्लग  / यापिंग हुल्लू पहने हुए नहीं दिखती हैं।

 सांस्कृतिक पहचान से अभिन्नता रखने वाले रिवाज़ो पर प्रतिबंध को लेकर बहस की जा सकती है। फिलहाल तानी समाज की हालिया स्थिति यह है की युवा लड़कियां यापिंग हुल्लू का जीतोड़ विरोध कर रही हैं।  उसे पूरी कठोरता से नकार रही है । 

पीढ़ियों का संघर्ष/जेनरेशन गैप हर समाज की सच्चाई है। बेहतर होगा कि वे आपसदारी में ही इसका हल निकाल लें। जिससे सरकार को कानून बनाकर बल प्रयोग करके जबरन उसे प्रतिबंधित करने से मुक्ति मिल जाए । युवा लड़कियों का यह कहना है कि इस तरह की वेशभूषा उन्हें हास्यास्पद बनाती है। उनके रोज़गार-परक अवसरों को कम करती है। जिससे उनके जीवन की कठिनाई और दुरूहता  बढ़ जाती है। ग़ौरतलब है कि सरकारी प्रतिबंध के बावजूद दूरस्थ इलाकों और कोनो-अतरो में यह प्रथा आज भी जारी है।


______________नीलिमा

#womenaroundtheworld

#tribes

#सौंदर्यबनामशारीरिकविरूपता

#स्त्री_03

Comments

Popular posts from this blog

तीजनबाई और पण्डवानी

🖤 छूटी आदम से जन्नत : लखनऊ रिविजिटेड - 01

विश्व की प्राचीन सभ्यताएं: नीलिमा पाण्डेय