♦️लखनऊ के गिरजाघर :02
♦️लखनऊ के गिरजाघर :02
कैन्ट आमतौर पर शहर का किनारे का हिस्सा होता है। फ्रांसीसी भाषा के इस शब्द का मायने ही कोने में स्थित होना है। औपनिवेशिक काल में भारत में ढेर सारे कैंटोनमेंट एरिया बनाये गए। उनमें से अनेक आजाद भारत में बदस्तूर जारी हैं। 1857 के विद्रोह के दौरान शहर लखनऊ और अवध सूबे में ठीक-ठाक हलचल रही। हलचल के सफ़हे तमाम हरफ़ों में तारीख़ में दर्ज़ हैं। बीता वक़्त इस शहर और सूबे के लिए हौलनाक रहा। अंग्रेजी दमन की जो तहरीरें मिलती हैं कयामत सरीखी हैं। शहर के नवाब , आवाम और नक़्श ने उसकी भारी कीमत चुकायी। शहर को मटियामेट करने में अंग्रेजी प्रशासन ने कोई कसर न उठा रखी। लगभग ढह चुकी मूसाबाग की इमारत और लखनऊ रेजीडेंसी के हिस्से उस वक़्त की गवाही देने के लिए काफ़ी हैं।
विद्रोह का नतीजा ये हुआ कि शहर में सेना-पलटन की आमद बढ़ा दी गयी। मड़ियांव का कैन्ट इलाका तो विद्रोह के दौरान तहस-नहस हो चुका था। इसलिए सैनिकों के लिए दिलकुशा में नए कैन्ट की स्थापना हुई। लड़ाई-झगड़ों में धार्मिक वैमनस्यता सर्वाधिक परवान चढ़ती है। विद्रोह के दौरान मड़ियांव कैन्ट के साथ-साथ शहर के पुराने तीनों चर्च भी नष्ट हो गए थे जो मड़ियांव , रेजीडेंसी और गोलागंज के पादरी टोला में स्थित थे। धर्म की परिधि में अपने अच्छे-बुरे का हिसाब-किताब करने वाली आदम जात रिहाइश और आमदोरफ़्त की जगहों में पहले-पहल धार्मिक संरचनाओं की तलाश करती है। विद्रोह की अलख जगने के बाद गाढ़ी होती नफ़रत ने ईश्वर की याद को गहरा किया। अंग्रेज सैनिकों की धार्मिक अभिव्यक्ति और मानसिक संतोष के लिए गिरजों की जरूरत महसूस की गई। नये गिरजे तामीर हुए। तीन बरस के भीतर 1860 में लखनऊ के पास इबादत के लिए चार गिरजे तैयार थे।
बीच के तीन बरस ईसाई धर्म के मानने वाले रविवार को होने वाली अपनी सामुहिक प्रार्थनाओं के लिए हजरतगंज स्थित अमजद अली शाह के मक़बरे का इस्तेमाल करते रहे। अमजद अली शाह का मक़बरा सिब्तेनाबाद इमामबाड़े के नाम से जाना जाता है। यही वजह थी कि इमामबाड़े के आसपास कुछ एंग्लो-इंडियन ईसाई परिवार बस गये। मिस सिडनी में अपने दस्तावेज़ "हिस्टोरिक लखनऊ" में दर्ज़ किया है कि, 'लार्ड कैनिंग जब दूसरी बार लखनऊ तशरीफ़ ले आये आये तो इस मक़बरे में आयोजित होने वाली चर्च सर्विस में शामिल हुए'।
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1860 में तामीर हुए चार गिरजों में ऑल सेंट्स न्यू गैरिसन चर्च बेहद खूबसूरत है। उसका पूरा परिवेश रूमानी है। ढेर सारे कद्दावर छतनार पेड़ों से घिरी लाल रंग से रंगी दरख्तों के साये में आधी ढकी , आधी छिपी इमारत एक अलग ही दुनिया की तस्वीर रचती है। लगता ही नहीं कि हम भीड़ से अटे-पटे उसी शहर में खड़े हैं जो ध्वनि और वायु प्रदूषण से आक्रांत हर वक़्त चिढ़ा सा दिखता है। गिरजे की चार दिवारी उसके पुराने होने की तस्दीक़ करती है। आजकल की किलेबंदी सरीखी चारदीवारी की तुलना में उसकी कमर से नीची दीवार इमारत की भव्यता को बढ़ा देती है। कुछ दिनों के अंतराल पर गिरजे की इमारत को मय परिवेश निहार आना हमारा पसंदीदा शगल है। गेट ज़ियादातर चेन से आलिंगनबद्ध मिलता है। भीतर जाने की इजाज़त नहीं है।
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एक दफ़ा तस्वीर उतार वापस चलने को पलटे ही थे कि भीतर से एक स्कूटर सवार आता दिखा। पास आते ही बरज दिया उसने,
' क्या कर रही हैं? तस्वीर लेने की इजाजत नहीं है '।
' क्यों भला? '
जब हमने पूछा , तो कोई ठीक-ठाक जवाब उसे नहीं सूझा। आग्नेय नेत्रों से देखता चलता बना। कुछ ही देर बाद जब वापस लौटा , तो हमें वहीं ठिठका देख जाने क्या सोच कर गेट की चेन खोल भीतर जाते हुए हमें भी आमंत्रित कर गया।
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सहर्ष भीतर जाकर हमने गिरजे की ख़ूबसूरती को इत्मीनान के साथ पास से निहारा और परिवेश को दाएं-बाएं , आगे-पीछे हर अलंग से निरखा । भीतर का सन्नाटा और उचाट माहौल मन रमने के आड़े आ रहा था। गिरजे का वास्तु जितना ख़ूबसूरत है उसके रख-रखाव का रवैया उतना ही अफ़सोसनाक। परले दर्जे की वीरानी और सन्नाटे की इन्तिहा असहज कर रही थी। परिन्दा भी पर नहीं मार रहा था। कुछ कहने-सुनने की आदम मौजूदगी तो दूर की बात ठहरी। सर्द मौसम , तुर्श हवा , चमकती हुई धूप। नज़र की ज़द में कुछ ठहर ही नहीं रहा था।
दाएं-बाएं बेमकसद डोल कर अंततः हमने एक कोने में सीढियों पर आसान जमाया। बहुत ग़ौर से देखने पर भी बाहरी दीवारों से भीतर का कोई सुराग नहीं लग रहा था। दरवाजे धूल से सने हुए थे। बेपरवाह पड़े कुछ गमले , एक दरवाजे से लटकता न जाने कब का छूटा हुआ गुलाबी रंगत वाला लेडीज पर्स , ढेर सारे बिखरे हुए सूखे पत्ते ।
यहाँ कोई आता भी है ? ज़ेहन में इस सवाल के अंकुरित होने के साथ ही घास के बीच बनी हुई संकरी सी पगडण्डी पर नज़र पड़ी। उसकी चौड़ाई ये बता रही थी कि कम से कम एक जोड़ा पैर तो इस पर अक्सर गुज़रते होंगे। काफ़ी देर तक झांक-ताक करने के बावजूद कोई केयर टेकर नज़र नहीं आया। दुर्वासा मनोवृत्ति वाला स्कूटर सवार भीतर पता नहीं कहाँ गुम हो गया था। जानकारी हासिल होने का कोई मंसूबा पूरा न होते देख कुछ तस्वीरें उतार हम वापस लौट आए।
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लौट कर किताबें पलटीं तो मालूमात बढ़ी। जो गिरजे की इमारत हम आज देखते हैं वह दरअसल 1906 की है। 1860 वाला गिरजा छोटा होने की वजह से उस वक़्त की जरूरत के मुताबिक नाकाफ़ी था। विद्रोह के बाद शहर में अंग्रेजी पलटन की संख्या बढ़ जाने की वजह से तय पाया गया कि बड़े गिरजे के बिना काम चलाना मुश्किल है। इसलिए पुराने को ध्वस्त कर नया गिरजा बना जिसे 'आल सेंट्स गैरिसन' के बजाय 'आल सेंट्स न्यू गैरिसन चर्च' नाम दिया गया। इस बात की जानकारी देने वाला एक पत्थर भी गिरजे में मौजूद है जो पुराने चर्च की वेदी की जगह को चिन्हित करता है।
आज भले ही इस गिरजे में जाने वालों की गिनती 30-40 के आस पास है अपने समय का यह बैठने की सर्वाधिक सीटों की संख्या रखने वाला गिरजा रहा है। इसकी बेंचों की खास बात पिछले ऊपरी भाग में बंदूक रखने के खांचों की व्यवस्था है। अनुमान है कि विद्रोह के बाद के आफ्टर इफेक्ट की वजह से सैनिक गिरजों में भी सशस्त्र रहते थे।
बीते दिनों की रौनकें तो जाती रहीं। इतवार को ज़रूर इस गिरजे में सुबह 10-12 के बीच कुछ हलचल देखी जा सकती है। ब्रटिश इंजीनियर जोन्स रैन्सम का डिजाइन किया यह गिरजा वास्तुकला का शानदार नमूना है। 1908 में इसकी बनवाई की लागत ₹91000- थी। वीरान निस्पृह खड़े इस गिरजे का परिवेश आज भी बेहद मोहक है।
_________नीलिमा
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