किताबें जो पढ़ी गईं : सियाहत

 गहरे रंगों के मोजैक में बिंधा हुआ कोलाज़...


 हमारे समाज में यात्रा वृतान्त लिखने-पढ़ने और समझने के बीज गहरे दबे हैं और इनके लिखे जाने का इतिहास भी ठीक-ठाक विस्तार रखता है ।इस पृष्ठभूमि पर जब कोई यात्रा -वृतांत दस्तक देता है तो उसका मूल्यांकन विविध मानकों और पैमानो पर किया जाता है।'सियाहत' इस मामले में अलहदा है।वजह यह कि उसने दस्तक के साथ ही अपना हस्तक्षेप दर्ज़ किया और ज्ञानपीठ नवलेखन पुरस्कार से अलंकृत हुआ। इस तरह से अलंकृत दस्तावेज़ को थामने,पढ़ने और सम्भालने का पैमाना ही बदल जाता है।रवायतों,रूमानियत और जिंदगी के इश्क़ में डूबा हुआ यह दस्तावेज़ पहले-पहल जहाँ मोहता है वह है,"आज हिंदुओं का गणपति ईद है ना रे " और इसी के साथ इससे गहराई से गुजरने की तलब पूरे तीखेपन के साथ बढ़ती है।जैसे-जैसे आप दक्षिण के इस सफ़र को तय करते हैं निरंतरता में उत्सुकता और उदासी का एम्प्लीटयूड घटता-बढ़ता रहता है।कभी ख़ुशी का अतिरेक है तो कहीं गहरी मायूसी।इन मनोभावों के बीच पसरा है भौगोलिक विशेषताओं को समेटता विवरण, परंपराओं का विश्लेषण, ज्यादा से ज्यादा जान लेने की उत्कट अभिलाषा, सीमित साधनों से उपजी गहरी निराशा और इन सारी बातों के ऊपर छतरी ताने लेखक की जिजीविषा जो हर पल उसके साथ है,कहीं भी उसके दामन से छिटकती नहीं है। 'सियाहत' के खान-पान और धर्म से जुड़े संदर्भ रोचक हैं। ख़ासतौर पर ईसाइयत का देशीकरण।जाहिरा तौर पर हम जानते हैं कि चर्च के घण्टे और मंदिर की घण्टी में कोई ख़ास फ़र्क है नहीं।फ़र्क हमारी नज़रों में है।चर्च की मोमबत्ती और मंदिर का दिया एक ही शिद्दत से अंधेरे का सामना करते हैं।दोनों की लौ मन के अंधेरों को एक सा चीरती है। 'सियाहत' में देशज(बिहारी) शब्दों का इस्तेमाल इसके नमक को बढ़ाता है।यदि आप उस इलाके की बोली-बानी से वाकिफ़ नहीं हैं तो आप का शब्द ज्ञान बढ़ता है,अगर वाकिफ़ हैं तो वृतान्त में कुछ और गहरे पैठते हैं। जानने की उत्कट अभिलाषा और बता लेने की अदम्य लालसा के बीच 'सिहायत' का सफ़र रफ्ता-रफ्ता तफ्सील से बढ़ता है।कहीं कोई जल्दबाजी नहीं।एक-एक ब्यौरा तसल्ली से अपने विस्तार में उपस्थित है।ये तसल्ली ही है जो हमें मुतवान जनजाति के 'तेरा' गाँव की परिक्रमा करवा देती है।कुछ वक्त के लिए हम मानवशास्त्र के अध्येता के दृष्टिकोण से विश्लेषण करने लगते हैं। सफ़र से गुजरते हुए गली के एक मोड़ पर 'सियाहत' हमें संस्मरण लगती है तो दूसरी पगडंडी के आते-आते व्यक्तिगत डायरी में बदल जाती है।किसी चौड़ी सड़क पर यह दर्ज़ रिपोर्ट है तो पहाड़ी,जंगली रास्ते इसे विजुअल नैरेटिव में बदल देते हैं।इसमें रोचकता तो है ही साथ ही एक गहन आत्मीयता का भाव भी है।पुस्तक में पूरी चर्चा की धुरी यात्रावृत्त ही है।बीच-बीच में राजनीतिक जागरूकता का छौंक और सामाजिक विद्रूपता पर धारदार प्रहार हमें जगाए रखता है और हम मज़बूती से पैर जमाए इस यात्रा से रूबरू होते हैं, 'एलिस इन वंडर लैंड' की तरह खो नहीं जाते।वास्तव में 'सियाहत' जिंदगी से इश्क़ की बुनावट वाला दस्तावेज़ है,उसी की तरह गहरा और रहस्य से भरपूर..

 (पुस्तक:सियाहत, लेखक: आलोक रंजन, प्रकाशक:भरतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली,वर्ष:2018,पृष्ठ:132, ISBN: 9789387919075)

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