किताबें जो पढ़ी गईं : तू - फ़ू
तू-फ़ू
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तू-फ़ू की ऐतिहासिक पहचान कवि के रूप में अधिक है। वह राजनीतिज्ञ भी थे। उनका संबंध चीन के तांग वंश से है। समय 712-770 ई. के बीच रखा गया है। राजनीतिज्ञ के रूप में उनकी पहचान कोई खास मकाम हासिल नहीं कर सकी। नैतिकता और इतिहास को केंद्र में रखकर लिखी गई उनकी कविताओं पर चर्चा जरूर हुई।
दूधनाथ जी का एक कहानी संग्रह है , ' तू-फ़ू ' नाम से । बाद के दिनों का यह संग्रह साहित्य भंडार , इलाहाबाद से प्रकाशित है। इसमें सन 2000 और उसके आगे-पीछे की लिखी गई कहानियों को संकलित किया गया है । कुछ कहानियां इत्मीनान से पढ़ी जिनमें से एक 'नपनी' अपने रोचक विशेषण की वजह से याद रह गई। कहानी की जमीन दारुण है। संग्रह की एक और कहानी 'नव्य-न्याय' भी पसंद आई।
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संग्रह की कहानी 'नव्य-न्याय' से :
"मेरे पास किसी भी बात का कोई उत्तर नहीं था। जैसे किसी भी लेखक के पास नहीं होता। हालांकि लोग चाहते हैं कि उसके पास उत्तर हो। एक लेखक को मारने के लिए सभी 'विद्वान' हो जाते हैं , सभी 'सजेस्ट' करने लगते हैं , सबके तर्क जाग्रत हो जाते हैं, सबके अनुभव उफान मारने लगते हैं , सबकी हिंसा जाग उठती है। लेकिन जो ,'लेखक' है उसके पास कभी उत्तर नहीं होता। वही उसका 'उत्तरदायी' होना है। एक लेखक कृष्ण के विश्वरूपदर्शन में दांतो के बीच फंसा हुआ शव नहीं है। वह ज़िन्दा सबूत है। भीतर की अग्नि क्या है? यानी आत्मा का ताप। या कि जठराग्नि... या...कि सभी कुछ। सारी इंद्रियों की लय का धीरे-धीरे जल उठना। अगर तुम सचमुच एक लेखक होगे तो तुम्हारी यह गति-दुर्गति होगी।"
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तू-फ़ू नाम के आकर्षण में छानबीन की तो पाया इतिहास के इस किरदार पर अज्ञेय ने एक कविता भी लिखी है । कविता इस तरह से है :
तू-फ़ू को : बारह सौ वर्ष बाद / अज्ञेय
पुराने कवि को
मुहरें मिलती थीं
या जायदाद मनचाही
या झोंपड़ी के आगे राजा का हाथी बँधवाने का
सन्दिग्ध गौरव,
या यश,
प्रशंसा,
दो बीड़े पान,
कंकण, मुरैठा,
वाहवाही।
या जिसे कुछ नहीं मिलता था
उस की सान्त्वना थी
बहुत-सी सन्तान
भरा-पुरा खानदान
हम तुम, दोस्त, नये कवि बेचारे :
प्रजातन्त्र में पाते हैं
प्रजापत्य विरोधी नारे :
दो या तीन बच्चे बस!
यह कि हम ने ईजाद किया
यही एक नया रस?
- अज्ञेय
ग्वालियर, 15 अगस्त, 1968
तू-फ़ू , चीनी कवि , सन् 713-790
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कहानियों का यह संग्रह अपने कथावस्तु की वजह से आकर्षित करता है। हर कहानी एक नई पृष्ठभूमि के साथ एक अलग परिवेश में ले जाती है। कुछ कहानियां मोनोलॉग शैली में आगे बढ़ती हैं । कथ्य के विस्तार के साथ मानसिक द्वन्द की भी तमाम पर्ते उघाड़ती इन कहानियों की परिस्थितियों के साथ आंशिक रूप से ही सही पाठक लयबद्ध होने लगता है। सुख और खुशी की अनुभूति से दूर कई मायनों में यह कहानियां अपने आसपास की कहानियां है । ज्यादातर का रचनाकाल 1999 से 2010 के बीच का है। कहानियों के अंत में ( संभवतः) उनके लिखे जाने की तिथि दर्ज है।
'दो पीढ़ियां' , 'टोपी वाले' , '1857 की गाली , 'नाम में क्या रखा है!' निराश समाज के उदास कर देने वाले कथ्य हैं। पहलवान' और 'मसखरा और पिछलग्गू' एक अलग ही दुनिया का हिस्सा हैं। 'एक सनातन प्रेम कथा' अतीत और वर्तमान के बीच गोते लगाती सर्वाधिक लंबा रचनाकाल (1994-2001) रखती है। 'माननीय न्यायमूर्ति जी लोग और सन्नाटा' एक अनचीन्हे विलाप पर केंद्रित है जिसमें शब्द दर शब्द हम सामाजिक रूदन से रूबरू होते चलते हैं। 'आख़िरी छलांग' अर्श से फर्श के रूपक को नायाब तरीके से गढ़ती है।इस कहानी के अंत में हम क्षण भर को किंककर्तव्यविमूढ़ से हतप्रभ रह जाते हैं।
कथ्य जो सामाजिक परिवेश से एकसार हो उठे द्वन्द , दर्द , विवशता को रेखांकित करे प्रासंगिक लगता है।
__________नीलिमा
(पुस्तक का नाम : तू-फ़ू , लेखक : दूधनाथ सिंह ,
प्रकाशन : साहित्य भण्डार , इलाहाबाद, वर्ष : 2011)
नोट : आवरण पृष्ठ से इतर दी गई तस्वीर दी गयी तस्वीर तू-फू की है । उनका समकालीन पोट्रेट नहीं मिलता है। यह एक आर्टिस्टिक इंप्रेशन है जिसे बाद के समय में रचा गया।


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