किताबें जो पढ़ी गईं : दिल्ली
बकौल खुशवंत सिंह बीस वर्ष से अधिक समय में लिखा गया ये उपन्यास।इस उपन्यास में दिल्ली की कहानी को शुरू से अंत तक (सन 1984) समेटने की कोशिश की गई है। खासियत है इतिहास के फ्रेम में इसे कैद करना । अंदाज खुशवंत सिंह वाला ही है,बेबाक और बिन्दास। खरा-खरा इतिहास न ढूंढे तो सजीवता और जीवंतता के लिए पढ़ा जाने लायक है । एक तथ्य जो इसे खास बनाता है वह ये कि खुशवंत सिंह के दादा सरदार सुरजन सिंह और पिता सरदार सोभासिंह दिल्ली को बनाने वाले बिल्डरों औऱ ठेकेदारों में प्रमुख माने जाते हैं। किस्सागोई के साथ दिल्ली का इतिहास है। पढ़ा जाना चाहिए। ----------------------
दूसरा पहलू..
यह वो #दिल्ली नहीं, #खुशवंत_सिंह की है!
००००००
क्या शेरशाह सूरी का मकबरा दिल्ली में है? नहीं, दिल्ली में नहीं, वह सासाराम (बिहार) में है. क्या तख्तताउस को १८५७ के गदर के बाद अंग्रेज लूटकर इंग्लैंड ले गये थे?, नहीं, उसे तो ११८ वर्ष पूर्व सन १७३९ में मुगल बादशाह मुहम्म्द शाह रंगीले के शासन काल में ईरानी लुटेरा नादिर शाह लूट ले गया था. दिल्ली का जंतर-मंतर राजा मानसिंह ने नहीं उसके प्रपौत्र जयसिंह ने बनवाया था. ऐसी ही तमाम त्रुटियों से भरी है चर्चित विद्वान् लेखक खुशवंत सिंह की किताब "दिल्ली" जिसके लिए कहा जाता है कि पूरा करने में उन्हें ढाई दशक के आसपास का समय लग गया था. किताब का प्रस्तुतिकरण लाजवाब है, उनके पास भाषा है, शिल्प है, पर इतिहास की दृष्टि को उन्होंने गौण स्थान दिया है. फिर वे मूल रूप से अंग्रेजी के लेखक हैं, यहाँ बात हो रही है "दिल्ली" के हिंदी संस्करण की, जिसे उषा महाजन ने पूरा किया था. उन्होंने जितने मनोयोग से उसे किया, ऐसा किसी और के लिए करना आसान न होता. इसके बावजूद खुशवंत सिंह ने इन त्रुटियों के लिए सिर्फ अनुवादक को जिम्मेदार बता कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली थी, यह दुखद है. आगरा के चर्चित इतिहास लेखक राजकिशोर शर्मा 'राजे' ने जब ऐसी ही और भी तथ्यात्मक विसंगतियों की ओर खुशवंत सिंह का ध्यान आकर्षित किया, तो उन्होंने एक पोस्टकार्ड लिख कर ऐसा बताया था. किताब की अन्य त्रुटियों को इंगित करता यह पत्र और उस पर प्राप्त उत्तर की प्रति सुधि पाठकों के संदर्भ के लिए संलग्न है. कम से कम उत्तर तो दिया, आज के लेखकों से ऐसे उत्तर की कल्पना भी नहीं की जा सकती. शायद नये संस्करण में त्रुटि न हो, पर फिर भी किताब में दिए गए इतिहास की प्रमाणिकता पर न जाइए, सिर्फ उनकी निगाह से दिल्ली के बसने, उसके क्रमिक विकास के रोमांच को महसूस कीजिये!
- राज गोपाल सिंह वर्मा नोट

Comments
Post a Comment