किताबें जो पढ़ी गईं : सबको अमर देखना चाहता हूँ
संस्मरण विधा में लिखी गयी अनेक पुस्तकों में 'सबको अमर देखना चाहता हूँ कुछ अलग ठहरती है। ये संभवतः दूधनाथ सिंह जी की अंतिम प्रकाशित पुस्तक है। जहाँ तक मुझे याद है सबसे पहले मैंने उनकी कृतियों में ' नमो अन्धकारम ' पढ़ी थी जो किसी पत्रिका हँस या कथादेश में प्रकाशित हुई थी। उससे पहले काशीनाथ सिंह जी की 'काशी के चार यार' से उनके नाम से परिचय हुआ था। साहित्य कभी मेरे अध्ययन की विधा नहीं रहा। जिस वक्त हम लोग विश्वविद्यालय में पढ़ रहे थे उस वक़्त इंटरनेट भी सुलभ नहीं था। हमारी जानकारी का स्रोत पत्र-पत्रिकाएं,अख़बार और दूरदर्शन ही थे। हम लेखकों को उनकी कृतियों से पहचानते उनके नाम से जानते थे। शक्ल,शहर,संस्थान से पहचानने के संदर्भ और बातें सीमित थे।किस्से, कहानी,आलोचना हम लोग मनोरंजन के निम्मित ही पढ़ते थे।उस पर टीका-टिप्पणी और विश्लेषण के संदर्भ व्यक्तिक या फिर आपसी होते थे। जिन संस्मरणों से हम गुजरे हैं उनमें विश्वनाथ त्रिपाठी के कुछ संस्मरण बेहतरीन हैं। कांतिकुमार जैन भी इस विधा में सिद्धहस्त हैं। दूधनाथ जी का ये संस्मरण कुछ अलग है।इसमें लगातार एक खामोश उदासी तिरती रहती है। चंद्रशेखर जी और अमृत राय को छोड़ दें तो शेष सभी उनके अभिन्न मित्र हैं। साहित्य जगत के महत्वपूर्ण लोग हैं। केवल चंद्रशेखर जी ही इस मामले में अपवाद हैं। ये पूरा संस्मरण स्मृति-विस्मृति से जूझता हुआ चलता है। इसमें अंतर्निहित उदासी की वजह शायद उम्र के अंतिम पड़ाव में इसका लिखा जाना है। शुरुआत में लिखे गए दो शब्द में वह कहते हैं, "वे दिन चले गए हैं जब हम थे। अब हम कहाँ हैं। जीवन एक आश्चर्य की तरह बचा है। और शायद आश्चर्य की तरह ही नष्ट हो जाएगा।संतोष यही है कि हमने अपना काम अपने ढंग और अपनी कमजोरी के साथ बखूबी निभाया।कोई कोताही नहीं की।" सतीश जमाली,चन्द्रशेखर, अमृत राय,विजय मोहन सिंह और सत्यप्रकाश जी को समर्पित इस संस्मरण से गुजरना एक अलग अनुभव है।संस्मरण विधा की एक अलग शैली से परिचय है। साहित्य में रुचि हो तो इसे पढें। इसे पढ़ कर ही हम लेखक की सबको अमर देखने की ख़्वाहिश को एक कदम आगे बढ़ा सकते हैं।
__________________नीलिमा
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