किताबें जो पढ़ी गईं : कुली लाइन्स
गिरमिटिया और कुली दोनों ही शब्दों से हम सब वाकिफ़ हैं। अपने अर्थ से इतर इन दोनों ही शब्दों के गहरे ऐतिहासिक निहितार्थ हैं।जिनको समझने की कई परतें हैं,जिनके अनेकानेक विविध आयाम हैं। 'कुली लाइंस' में एग्रिमेंट से गिरमिटिया की यात्रा तय करते-करते हम इतिहास के तमाम दरवाजों को खोलते हुए ठहरते,ठिठकते,झिझकते, किंकर्तव्यविमूढ़ होते हुए एक ऐसे मुहाने पर जा खड़े होते हैं जहाँ रोयें या हँसें समझ में नहीं आता। मायूसी और खुशी दोनों एक साथ दामन थामें खड़ी मिलती हैं। आधुनिक इतिहास को पढ़ते हुए भावनाओं का ज्वारभाटा अक्सर चढ़ता-उतरता रहता है। 'कुली लाइंस' से गुज़रते हुए इसकी तीव्रता और अधिक रही क्योंकि घटनाक्रम विदेशी जमीन पर घट रहा था। कितनी भी ग्लोबल की घुट्टी पी रखी हो लोकल का मोह छूटता ही नहीं है। इतिहास से गुज़रते हुए अपने और पराए देश का बोध गहरा ही जाता है। प्रवीण झा को बहुत शुक्रिया कि उन्होंने इतिहास के इस अनछुए पक्ष को न सिर्फ़ खोजा बल्कि हिन्दी भाषा में हम सबके बीच रखा। इतिहास बोध के साथ इतिहास विधा की क्लिष्टता और दुरूहता के बिना भाषा की सरसता को बनाये हुए हिन्दी में लिखा गया ये दस्तावेज एक बार जरूर पढ़ा जाना चाहिए। कथेतर साहित्य में रुचि न रखते हों तो भी पढ़िए। गल्प की तरह ही पढ़ डालिए। भाषा सरल है सरस है। हो सकता है इसे पढ़कर आपके भीतर का जातीय दंभ और उससे जुड़ा विशिष्टता बोध ही कुछ कम हो जाए। आप नुकसान में नहीं रहेंगे। भविष्य में इस विषय पर काम करने वाले शोधर्थियों के लिए निश्चित रूप से ये किताब रेफरेंस बुक का काम करेगी। तमाम सूचनाओं के साथ-साथ ढेरों खदबदाते हुए सवाल भी लेखक ने इसमें रख छोड़े हैं।
__________________नीलिमा
पुस्तक :कुली लाइंस; लेखक:प्रवीण कुमार झा; प्रकाशन: वाणी,नई दिल्ली; वर्ष:2019;पृष्ठ:279
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