किताबें जो पढ़ी गयीं : सफ़र एक डोंगी में डगमग

 यात्रा वृतांत लिखने-पढ़ने की परंपरा ठीक-ठाक पुरानी है।पढ़ने लिखने से जुड़ाव रखता इंसान कभी न कभी उनसे दो चार जरूर होता है।यदा-कदा हम ऐसे किसी वृतांत से टकराते हैं जो अपने अनूठेपन में हमें मोह लेता है। 'सफ़र एक डोंगी में डगमग' एक ऐसा ही वृतांत है। पुस्तक के नाम से ही संकेत मिल रहा था कि ये सफ़र डोंगी में बैठ हिचकोले खाते नदी की लहरों को निहारते बीतेगा।वास्तव में मन और आंखों से गुजरते हर्फ़ों के दरमियान रहा मेरे लिए इस पुस्तक का सफ़र।सफ़र की शुरुआत से ही इस बात का एहसास होने लगता है कि यात्रा रोमांचक होगी।जैसे- जैसे पन्ने पलटते हुए हम आगे बढ़ते हैं यात्रा रहस्य और रोमांच से घिरती जाती है।इस रहस्य और रोमांच पर इत्मीनान से तफसिरा करने पर सफ़र रूमानी लगता है पर वास्तव में है बेहद कठिन जिसमें हर अगला पल अनिश्चित है।नदी के रुख,डोंगी की क्षमता, नदी का बहाव, हवा का रुख और यात्रियों की हिम्मत को एक साथ लयबद्ध करके ही हम इसे महसूस कर सकते हैं। डोंगी में यात्रा की शुरुआत दिल्ली की एक छोटी सी नहर ओखला हेड से शुरू होती है।मंज़िल कोलकाता में हुगली नदी है।इस यात्रा को पूरा करने में कुल जमा दो महीने दो दिन ऊपर(62 दिन) का समय ख़र्च हुआ।पुस्तक में विस्तार से एक- एक दिन का ब्यौरा शब्द-चित्र के माध्यम से खींचा गया है। हर दिन का ब्यौरा रोमांच के साथ बेचैनी,उकताहट के साथ जिजीविषा और दोस्ती की गर्माहट समेटे हुए है। साथ में हैं नदियों के घाट,कुछ किस्से,कुछ किस्सागोई,दोस्ती की चुहल,नोक-झोंक और इन सबके बीच बिंधा हुआ इतिहास।जैसे- जैसे हम घाट दर घाट शहर दर शहर गुजरते हैं - मथुरा, आगरा,इलाहाबाद, बनारस, कानपुर, पटना,कोलकाता - ये बात हम पर खुलती जाती है कि हम समय के सफ़र पर हैं। पिरोए गए हैं जिसमें ऐतिहासिक महत्व के कुछ नगर। पूरे वृतांत में लेखक का इतिहास और पुरातत्व में रुचि रखने वाला मानस सजग और सतर्क दिखता है।परत दर परत महीन ब्यौरों को हम रोचक अंदाज़ में पाते है। 'आगे क्या?' की उत्सुकता निरंतर बनी रहती है। ख़ास बात ये है कि इस पूरे सफ़र में लेखक की सहयात्री डोंगी भी एक ज़िन्दा क़िरदार में है। अगर आप नएपन के साथ किसी रोमांचक सफ़र को घर बैठे तय करना चाहते हैं तो राकेश तिवारी की 'सफ़र एक डोंगी में डगमग' जरुर पढ़ें।यक़ीनन आप निराश नहीं होंगे। _______________नीलिमा



 (नाम : सफ़र एक डोंगी में डगमग/ लेखक: राकेश तिवारी /प्रकाशन: सार्थक(राजकमल प्रकाशन का एक उपक्रम)/ पृष्ठ: 200/ प्रकाशन:2014/ISBN : 978-81-267-2691-2)

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