किताबें जो पढ़ी गईं: किन्नर धर्मलोक
किन्नर धर्मलोक कृष्णनाथ जी के यात्रा वृत को पढ़ते हुए.. एकाकी यायावर के रूप में कृष्णनाथ जी की सघन पहचान है। वस्तुतः वे हिमालय के बटोही रहे हैं। किन्नर धर्मलोक महायानी हिमालय के दुर्गम अंचल में उनके अनुभवों का सार है। इसके माध्यम से हम हिमालय से तो परिचित होते ही हैं साथ ही साथ लेखक के मनोविज्ञान पर पड़ने वाले प्रभाव से भी रूबरू होते चलते हैं। यह संस्मरण प्रकृति और संस्कृति की यात्रा करते हुए निरन्तरता में गढ़ी जाती मनोवृत्ति / निरन्तर मनोवृत्ति पर पड़ने वाले प्रभाव की भी परिक्रमा करता चलता है। छोटे छोटे वाक्यों का विन्यास भावार्थ में गहरा और कविता की तरह लयबद्ध है । राग और विराग का एक अद्भुत दस्तावेज यह। कुछ किस्से , कुछ मिथक और कुछ इतिहास के ताने पर इसका बाना कसा गया है। मात्र पर्यटन से इतर की जाने वाली यात्राएं प्रायः इसी धुरी की परिक्रमा करती हैं। दरअसल देखने और जानने के बाद जो अपने भीतर उकस जाता है वही यात्रा का मर्म होता है। शास्त्र और शिल्प से जुदा सिर्फ़ एक अनुभव जो नितांत व्यक्तिक होता है। पर्यटक की तरह देखने के अपने सुख हैं । देखने से एक कदम आगे बढ़कर यात्री की तरह जानने का जुनून शुरुआत में तो व्यग्र करता है पर उसकी परिणीति सुकून में होती है। ये हासिल सुकून ही हमें फलसफे के दरवाजे तक पहुँचता है। यात्रा का उद्देश्य इसी पड़ाव तक पहुँचना है। आसक्ति से विरक्ति के बीच की दूरी को तय करते समय चुनी गई पगडंडियों में करुणा का साथ रहे उसके लिए जरूरी है सफर करना। सफर करना सांसों को सहेजना है , पड़ाव पर पहुँचना है इसलिए जरूरी है चलते रहना। इस यात्रा वृत्त पढ़ते हुए हम बखूबी महसूस करते हैं कि यात्रा बाह्य और आंतरिक दोनों स्तरों पर साथ-साथ चलती है। बाहर और भीतर चलने वाली यात्राओं का हम-कदम होना ही पूर्णता की तलाश में अपूर्ण होने के एहसास को गहरा करता है।
______________नीलिमा
07-01-2022 (डायरी)
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