किताबें जो पढ़ी गईं : काशी का अस्सी
'काशी का अस्सी' उपन्यास, रिपोर्ताज और किस्सागोई के बीच झूलता पूर्वांचल में बसने वाली खांटी आवाम की जिंदगी का फलसफा है। लिखा इसे पहले गया था। इस बीच पूंजीवाद और बाज़ार ने पूर्वांचली शहरों का रंग- रोगन ऊपरी तौर पर बदल दिया है। चमक-दमक की ये रंगत कलई सरीखी है। खुरच कर देखो तो आत्मा उघड़ कर सामने आ जाती है। फिर भी बदलाव तो है ही। ये बेहतरी की ओर है या कमतरी की ओर कहना मुश्किल है। फैसला उस फलसफे के बरअक्स ही किया जा सकता है जिस के आईने में आप दुनिया को देखना चाहते हैं। यह पूर्वाग्रह से डबडबाया हुआ मुद्दा है। इस पर बात करने के हम मुतासिर भी नहीं हैं। इस उपन्यास में आप 80 से 90 के दशक के पूर्वांचल को जरूर देख सकते हैं। इस वजह से मेरे लिए यह बचपन के नास्टेल्जिया की घुट्टी बन जाता है। बहरहाल पूर्वांचली समाज आकंठ राजनीति में डूबा हुआ समाज है। उसकी झलक यहां 'काशी के अस्सी' में मौजूद है। झलक इसलिए कि यह शहर बनारस के दक्षिणी छोर पर बसे अस्सी नाम के मोहल्ले की गीतिका है जिसके बोल गुने गए मोहल्ले की ही भीड़भाड़ वाली एक दुकान पर। दुकान जिस पर मिलती थी चाय और भाँग.. सरकार बनाना और गिराना जिसकी हर बहस का था मकाम। जो उलझी रहती थी दिन रात लड़ाई-झगड़ों,बहस-मुबाहिसों में और गाली-गलौज के रास्ते राजनीति के गलियारों की अनवरत परिक्रमा करती। न बैठकी चूकती न ही बहस। पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती रहती बहसें अपनी। पृथ्वी सूरज के चारो ओर बहसें राजनीति के। इस बैठकी,बहस और राजनीति के केंद्र में हैं आमजन,आम पाठक और उनकी निहायत ही आम भाषा। भाषा जो अस्सी के इस काव्य को सौंदर्यशास्त्र की नई ऊंचाइयों तक ले जाती है। इसमें जिंदगी का नमक है। ना कम! ना ज्यादा!! कहीं तीखा... कहीं चटपटा.... इन सबके बीच हर्फ़ दर हर्फ़ एक घुटते हुए समाज की आहट भी है जो कभी-कभी दबी हुई चीख के रूप में उभर जाती है। समाज जो ऊपर से तो फक्कड़, लापरवाह और बेपवाह बना हुआ है लेकिन भीतर-भीतर नजर और नजरिए में आने वाले बदलाव को महसूस कर रहा है। वह देख रहा है कि बाहर की दुनिया तो बदल ही रही है भीतरी दुनिया भी उसके साथ सुर ताल में है। बदलाव ऐसा कि उसके दबाव में पूरी एक पीढ़ी हाशिये पर जाने को अभिशप्त है ; और जो न गयी,अड़ी रही तो दायम दर पर पड़ी मिलेगी। इस कातरता को एक कामयाब बुनकर की तरह बुना है काशीनाथ जी ने। बुनावट के धागों को कहीं परखने में चूके तो जिंदगी का स्वाद अधूरा रह जाएगा.. उसका साज बेसुरा हो जाएगा..
___________________नीलिमा
(पुस्तक : काशी का अस्सी, लेखक:काशीनाथ सिंह, प्रकाशित: राजकमल प्रकाशन,वर्ष: 2002)
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