किताबें जो पढ़ी गईं : भारतीय मुसलमान
"भारत और पाकिस्तान का विभाजन हमारे लिए हिंदू और मुसलमान का विभाजन नहीं था, पाकिस्तान के लिए भले यह हिंदू-मुसलमान का विभाजन था। बाद में पाकिस्तान के मेंटर बने मौलाना मौदूदी के लिए और उन जैसों के लिए बेशक यह हिंदू-मुसलमान का बंटवारा रहा हो, मगर भारत के लिए यह सह-अस्तित्व था, सहजीवन और मुसलिम कौम की कट्टरता का विभाजन था। मौलाना सैयद अबुल आला मौदूदी हमेशा हठीले अंदाज में चीख-चीख कर कह रहे थे कि मुसलमान किसी दूसरी कौम के साथ रह ही नहीं सकता। अल्लामा इकबाल ऐसा ही सोचते थे। मुसलिम कौम का एक बड़ा तबका बिल्कुल ऐसा ही सोचता था। इस हठीली मुसलिम कौम की एकरेखीय सोच के समानांतर विकसित हुई सहजीवन शैलीवाली साझी संस्कृति की गंगा-जमुनी धारा भी बहती चली आ रही थी- हजारों साल वाली सोच। वह हठीली धारा के प्रतिपक्ष में अपने हिस्से का वारिस होने वाली थी। एक विशाल मुसलिम आबादी ने महान विरासत वाली साझी संस्कृति की सोच का चयन किया। पाकिस्तान ने सोचा, उसने हिंदू-मुसलमान का बंटवारा कर लिया। भारत ने कहा, यह तो साझी संस्कृति की सोच वाले मुसलमानों का बंटवारा हुआ। भारत-पाकिस्तान का विभाजन तात्त्विक और मूल्यगत स्तर पर मुसलमानों का मुसलमानों के बीच बंटवारा बन गया। इस तात्त्विक और मूल्यगत विभाजन ने पाकिस्तान को एकदम से बौना कर दिया। कायदे-आजम जिन्ना के मरते ही वह झीना आदर्श भी फट-फूट गया, जिसमें वे कहते थे कि हिंदू शासित धर्मनिरपेक्ष और साझी संस्कृति की विरासत वाला भारत एक ओर और मुसलिम शासित धर्मनिरपेक्ष साझी संस्कृति वाला पाकिस्तान दूसरी तरफ। जिन्ना के जाते ही दशक भी न लगा, बल्कि उनके जीते-जी ही पाकिस्तान मौलाना अबुल आला मौदूदी वाली आकांक्षा के अनुरूप संकीर्णता में पूरी तरह ढल गया। एकरंगी, संकीर्ण और पिछड़ी सोच वाला पाकिस्तान। आज स्थिति सामने है। इसका मनोविश्लेषणात्मक अध्ययन इस पुस्तक में प्रस्तुत है। यह पुस्तक दो खंडों में विभक्त है।"
ऊपर दिया गया संदर्भ पुस्तक के दूसरे खंड से है। पढ़ कर देखिये। सोचने-समझने,तर्क देने, कुतर्क से बचने में मदद मिलेगी। इस बेसब्र समय में बेहद जरूरी है पढ़ना...
______________नीलिमा
भारतीय मुसलमान: इतिहास का संदर्भ (दो खंड) : कर्मेंदु शिशिर; भारतीय ज्ञानपीठ, 18, इंस्टीट्यूशनल एरिया, लोदी रोड, नई दिल्ली; 700 रुपए (प्रति खंड)
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