किताबें जो पढ़ी हुईं : खुशहाली का पंचनामा
विश्व के खुशहाल देशों में से एक नॉर्वे है। खुशी की पैमाइश करने वाले सांख्यिकी/आंकड़े ऐसा ही कहते हैं। देश जो लगभग छः महीने तक सूरज के दीदार से महरूम रहता है । उँह.. यह भी कोई देश है ? मन कुलबुला जाता है । हम तो दो-चार दिन भी सूरज बिन नहीं रह पाते। स्थानीयता की चाशनी में डूबा हमारा विशिष्टता बोध सर उठाता है। इससे पहले की इस चाशनी पर मक्खियां भिंभिनायें तार्किकता मोर्चा संभाले चाक-चौबंद हो उठती है। कुछ तो ख़ास होगा नार्वे में। हमने अपने महिमामंडन में तमाम शब्द और (कु)तर्क गढ़ रखे हैं। फिर भी खुशी के पायदान पर नॉर्वे से काफी नीचे हैं। भले ही हम कोरस बाँधते दिखें कि 'हम फटेहाली में भी खुश रहते हैं'। ढेर सारे सवाल सर उठाते हैं। आखिर खुशी के सूत्र क्या हैं ? क्या-क्या होना चाहिए एक देश के नागरिक के पास ख़ुश रहने के लिए ? क्या खुशी भी पैमाइश की कोई वस्तु है ? आध्यात्म को वैचारिक चौहद्दी से बाहर रखा जाए तो इस मानव जीवन का उद्देश्य क्या है ? कुछ है भी या रोजी-रोटी की धुरी पर ता-ता-थैया करना ही इसकी वास्तविकता है। बाकी सब कोरी कल्पना , हवा-हवाई बातें , शाब्दिक जुगाली है। अव्वल तो यह समझ लेना चाहिए कि नार्वे हमारी तरह फटेहाली के साथ 'ख़ुशी' से आलिंगनबद्ध देश नहीं है। आंकड़ों में वह दुनिया के अमीर (छठे पायदान पर) देशों में गिना जाता है। देश की अमीरी में ही ख़ुशी के गुणसूत्र मौजूद है। ये अमीरी जनसंख्या के चन्द नामों तक सीमित नहीं है। इसमें देश के हर नागरिक की हिस्सेदारी है । इस हिस्सेदारी से समाज कैसा आश्वस्त और निरपेक्ष बनता इसे समझने के लिए स्कैंडिनेवियाई और नार्डिक देशों की सांस्कृतिक , सामाजिक विशिष्टताओं को कीनली आब्जर्व करने की जरूरत है। इगैलिटेरियन सोसायटी , वेलफेयर स्टेट , इमोशनल कोशेंट जैसी बातें जो आज भी हमारे लिए दूर की कौड़ी बनी हुई हैं उनके समाज का अभिन्न हिस्सा हैं। *** ख़ुशहाली का पंचनामा में लेखक ने अपने नार्वे प्रवास के दौरान हासिल अनुभवों को साझा किया है। साझेदारी की ये प्रक्रिया तार्किक विश्लेषण और जगह-जगह भारतीय समाज के साथ तुलनात्मक अध्ययन के रूप में है। 'नार्वे बुद्ध की शरण मे में है'। मध्यम मार्ग का अनुयायी। ओवर लेडन मोरैलिटी से बच हुआ। पढ़कर तो ऐसा ही लगता है। देखकर जाने कैसा लगे। जहाँ पूरी दुनिया में चौतरफा आपाधापी मची हुई है दुनिया के कुछ कोनो में ज्यादातर लोग सुकून और संतुष्टि से लबरेज ख़ुद के साथ इत्मीनान से वक़्त बिता रहे हैं ऐसा पढ़ना और सोचना कल्पना में भी सुखद लगता है। अपने वक़्त का हम क्या करते हैं ? अपने खाली वक़्त को हम कैसे बरतते हैं ? उस खाली वक़्त में हम खालीपन के शिकार तो नहीं हो जाते? दरअसल अपने खाली वक़्त को हम कैसे भरते हैं ; जीवन के पूरे तिलिस्म पर यही 'कैसे' कुण्डली मार कर बैठा है। जिसने इस कुण्डली से गुजर मणि हासिल कर ली उसने ख़ुशी के अभेद दुर्ग में सेंध लगा ली। नार्वे के लोकतंत्र ने सिमसिम को खोलने का मन्त्र कंठस्थ कर लिया है। इसलिए खुशहाल है। पुस्तक में सत्रह छोटे- छोटे अध्याय हैं। भाषा सरस, कथ्य रोचक , शैली गागर में सागर वाली। प्रकृति और पर्यावरण से जुड़ी बातें संभव है आपकी जानकारी में हों लेकिन समाज , संस्कृति , आचार-विचार-शिष्टाचार , जेंडर आदि से जुड़े हुए संदर्भ जरूर जानकारी की एक नयी खिड़की खोलेंगे। नागरिकता को लेकर प्रवासी-द्वन्द भी बारीकी से रेखांकित होता मिलेगा। अलाइननेस से एक किस्म का दुराव हर जगह दिखता है , नार्वे में भी मिलेगा। कुल मिलाकर पढ़ने योग्य संस्मरण जो जीवन जीने के फ़लसफ़े को ख़ुद में समेटे हुए है। *** हैप्पीनेस इंडेक्स पर हर बार स्कैंडिनेवियाई और नार्डिक देश बाजी मार ले जाते हैं। 2021 की सूची में भी पहले से छठे स्थान पर यही काबिज हैं। ऐसा क्यों है? बस इस "क्यों" की तलाश में हम खुशहाली के इस पंचनामे तक जा पहुँचे। इसमें रोचक शैली में नॉर्वे के समाज और संस्कृति के विविध पक्षों पर चर्चा है। जाहिर है प्रवास संस्मरण है तो इंडिविजुअल आउटलुक के साथ ही है लेकिन पूरी तटस्थता के साथ सुरुचि पूर्ण ढंग से प्रस्तुत ये ब्यौरा अंत तक बांध कर रखता है। नार्वे की संस्कृति के विविध पक्षों से परिचित करवाता प्रवास संस्मरण।
(मांड्रेक पब्लिकेशन्स , भोपाल ,2020, पृष्ठ : 192)
--------------नीलिमा
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