किताबें जो पढ़ी गईं : रेहन पर रघ्घू
'रेहन पर रग्घू' पुराना उपन्यास है। पाठ्य सामग्री का चुनाव करते समय हम सब अपनी प्राथमिकताओं को तरजीह देते हैं। नए-पुराने से इतर साहित्य जगत में हुई चर्चा के हिसाब से अपना चुनाव करते हैं। कई बार लेखक के सामाजिक सरोकार भी उसे पढ़ने की उत्सुकता जगाते हैं। काशीनाथ जी को पहले-पहल 'हँस' में पढ़ा था ।'काशी के चार यार...' नाम से राजेंद्र यादव के संपादन में एक श्रृंखला छपी थी। वही लेखक से पहला परिचय था।उनके लेखन की छाप मन पर गहरी रही। इसलिए, 'नाम ही काफी है' वाले अंदाज में उनकी कोई भी कृति पढ़ ली जाती रही है 'रेहन पर रग्घू' को साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया है। जब यह पुस्तक प्रकाशित हुई उस समय तमाम चर्चाओं और कुछ विवादों के घेरे में भी रही। बड़े सम्मानित लेखकों की कृतियों को लेकर यह आम बात है। कोई भी लेखक अपने समय, सामाजिक सरोकार और उद्देश्य के तहत रचना करता है। उसे देखने, समझने, महसूस करने के लिए अपने पूर्वाग्रहों की कैद से निकलना होगा। फिर यथार्थ का साफ-साफ दर्ज होना इतना बुरा क्यों है? हर बार क्यों लक्षणा की चाशनी में लपेट कर उसे रखा जाए? पुस्तक की शुरुआत ही एक किस्म का आर्तनाद पैदा करती है और मन कसैला हो जाता है। जैसे-जैसे आप आगे बढ़ते हैं एक बुजुर्ग को अपनी आकांक्षाओं, उम्मीदों और घुटन भरे यथार्थ के बीच घिसटता हुआ पाते हैं। शुरुआत में अपने स्वाभिमान में वह परिस्थितियों के अनुरूप कतर-ब्यौत नहीं कर पाता और लगातार अपनों से, अपने आप से जूझता रहता है। बीते हुए दिन उसकी नजरों के सामने गड्डमड्ड होते रहते हैं जिनका सामंजस्य वर्तमान में बैठा पाना निरंतर मुश्किल होता जाता है। इस उपन्यास में एकसाथ बहुत सारे लेयर्स का फ्रेम है। समाज की अनेकानेक विसंगतियां परत दर परत उघड़ती हैं। चूँकि वे बहुत लंबे समय से आप के समाज में जड़ जमाए बैठी हैं इसलिए उनसे दो-चार होते हुए आप चौंकते तो नहीं ही हैं। हाँ! आँखे जरूर कडुवा जाती हैं। यह उपन्यास सामूहिकता, संवेदना और आपसदारी की जद्दोजहद का दस्तावेज है। बदलते हुए समय में आदमी की संवेदना पर पड़ने वाली गहरी चोट कैसे चीजों को छिन्न-भिन्न कर देती है कि आत्मीयता किरच दर किरच बिखर जाती है और यथार्थ की कड़वाहट बाज दफा मानवता को घोल कर कैसे पी जाती है। रोटी, कपड़ा और मकान की आदिम जरूरतों को भूमंडलीकरण के दौर में उपार्जित करने के तरीके कितने अमानवीय हो गए। इन तमाम बातों से रूबरू करवाता है यह उपन्यास। इसमें हाशिए का समाज है, देशज सच्चाई है, समकालीन मनुष्य की बेबसी है ,उसकी आकांक्षाएं हैं, व्यक्तित्व की दुरुहता और लालसाएँ हैं।साथ ही साथ शहर और गाँव के बीच अस्तित्व की लड़ाई है। काशीनाथ जी स्वयं ही लिखते हैं, '' अगर 'काशी का अस्सी' मेरा नगर था तो 'रेहन पर रग्घू' मेरा घर है और शायद आपका भी...'' काशीनाथ जी के लेखन पर किसी विशेष टिप्पणी की कोई दरकार नहीं है। उनके खरेपन, बेबाक, बेलौस अंदाज से हम वाकिफ हैं। लेखक ने यहाँ कोई समाधान नहीं सुझाया है ना ही कोई उपदेश दिया है। सिर्फ़ अपने सड़ेगले सामाजिक यथार्थ की स्वीकारोक्ति की है । चौतरफा व्याप्त दुःखों की जड़ में झांकना चाहते हैं तो एक बार जरूर पढ़ें।
__________________नीलिमा
(राजकमल प्रकाशन से सन 2008 में प्रकाशित)
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