किताबें जो पढ़ी गयीं : महाभारत

 महाभारत से हम सब परिचित हैं।यह हमारे दो महत्वपूर्ण महाकाव्यों में से एक है।आमतौर पर परंपरा और मिथकों के माध्यम से जो काल विभाजन हमारे जनमानस में समाहित है उसके दृष्टिगत महाभारत को हम रामायण के बाद का स्वीकारते हैं । हालांकि भाषा शास्त्रीय एवं सामाजिक विकास के विश्लेषण के आधार पर किये गए अध्ययन से यह बात खरी नहीं उतरती है।महाभारत का समय विस्तार दीर्घकालिक है।लगभग एक हजार वर्ष का विस्तार समेटे हुए है महाभारत , जबकि रामायण का समय संदर्भ सीमित और बाद का है। हमारे ये दोनों महाकाव्य कथा साहित्य के महत्वपूर्ण स्त्रोत हैं।महाभारत की खासियत ये है कि उसकी मूल कथा के इर्दगिर्द तमाम दूसरी कथाएँ परिक्रमा करती हैं।ये कथाएँ समाज के अध्ययन और विश्लेषण का महत्वपूर्ण आधार प्रस्तुत करती हैं।इनके माध्यम से विभिन्न आयामों में समाज के दो महत्वपूर्ण घटकों स्त्री और पुरुष की पारस्परिक प्रस्थिति का अध्ययन किया जा सकता है।साथ ही स्त्रियों के विविध रंगी बहुस्तरीय समाज को भी समझा जा सकता है।महाभारत में अनेकों ऐसे स्त्री पात्र हैं जो मूल एवं द्वितीयक कथाओं का हिस्सा हैं और पितृ सत्ता के मानकों के अनुरूप आदर्श व्यवहार करते दिखते हैं।किंतु कुछ ऐसे स्त्री पात्र भी हैं जो सवाग्रही हैं और अपने प्रति होने वाले अन्याय का विरोध करते हैं। वास्तव में ये ऐसे पात्र हैं जो स्त्री का जीवित इंसान होना महसूस कराते हैं।जो सहजता से हँसते हैं,रोते हैं और विरोध करते हैं।जरुरत पड़े तो विद्रोह भी। ऐसे महत्वपूर्ण स्त्री पात्रों में शकुंतला,देवयानी,गंगा,सत्यवती,अम्बा,अम्बिका, अम्बालिका,गंधारी, कुंती,हिडिम्बा,तपती, द्रौपदी, सुभद्रा का उल्लेख किया जा सकता है।ये सभी स्त्री पात्र आदिपर्व में उपस्थित हैं। इन स्त्रियों से सम्बंधित आख्यान पर गंभीरता पूर्वक विचार करने पर हम ये पाते हैं कि ये स्त्री पात्र समाज में स्त्री की परंपरागत छवि को तोड़ते हैं।आदि पर्व की पहली महत्वपूर्ण स्त्री शकुंतला है जो स्वेच्छा से दुष्यंत के साथ गन्धर्व विवाह करती है।महाभारत की शकुंतला कालिदास की शकुंतला (अभिज्ञान शाकुंतलम की नायिका) से मेल नहीं खाती। कालिदास की नायिका रोती, गिड़गिड़ाती भाग्य को कोसती दुष्यंत से अनुनय-विनय करती दिखती है। वह गर्भवती है,पति दुष्यंत के द्वारा ठुकराए जाने से अत्यंत विचलित है। किंतु महाभारत की शकुंतला दुष्यंत की राजसभा में अपने पुत्र का हाथ थामें प्रवेश करती है और अपने अधिकारों की निडरता से मांग करती है। दुष्यंत के द्वारा दुष्ट-तापिस कहे जाने पर वह प्रतिक्रिया स्वरुप कहती है कि, 'मेरा जन्म और कुल तुमसे श्रेष्ठ है'।वह अभिज्ञान शाकुंतलम की नायिका की तरह अस्वीकार किए जाने पर बिलखती नहीं है,बल्कि आहत अहम् से दुष्यंत को श्राप देती है,'उसका मस्तक शत खंडो में बंट जाए'।वह भरी राजसभा में घोषणा करती है कि दुष्यंत के सहयोग एवं स्वीकृति के बिना भी उसका पुत्र भरत पूरे राज्य का स्वामी होगा।वह विश्वास से कहती है कि ,'स्वयं वह ऐसे पुरुष के साथ नहीं रहना चाहती जो भरोसा तोड़ने वाला, झूठा और मक्कार है'। महाभारत की शकुंतला एवं कुछ अन्य उल्लिखित स्त्री पात्र इस बात का संकेत देते हैं कि इतिहास के प्रारंभिक चरणों में ही स्त्री ने अपने हाशिये पर ढकेले जाने का विरोध किया है,भले ही विरोध का वह स्वर कितना ही क्षीण कियूँ न रहा हो। महाभारत के ये स्त्री पात्र स्त्रीविमर्श के अध्ययन को एक नया आयाम देते हैं और ये संकेत देते हैं कि स्त्री समाज हमेशा से एकाश्म और एकरंगी नहीं था। उसके अनेक रंग और स्तर थे। वस्तुतः महाभारत की ये कथाएँ नए सिरे से समाज की पड़ताल करने में हमारी मदद करती है।स्त्री संदर्भ और सामाजिक विकास के अध्ययन के स्त्रोत के रूप में इन्हें जरूर पढ़ा जाना चाहिए।

______________नीलिमा


 (नाम:संक्षिप्त महाभारत/ अनुवादक: जयदयाल गोयन्दका/प्रकाशन: गीता प्रेस,गोरखपुर/वर्ष:2000/ पृष्ठ:827+838: खण्ड एक+दो )

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