किताबें जो पढ़ी गईं : लखनऊ की पाँच रातें
लखनऊ की पाँच रातें : अली सरदार जाफ़री ______________________________
सन १९९१-९२ में दूरदर्शन पर कहकशां नाम का एक धारावाहिक आता था I इसे बनाया था अली सरदार जाफ़री ने I जलाल आगा के निर्देशन में बना ये धारावाहिक उर्दू के छह शायरों को केंद्र में रख कर बनाया गया था I जाफ़री इन शायरों से खासे प्रभावित थे I इनमें से कुछ उनके जिगरी दोस्त भी थे I उन्होंने गहरा शोध करके धारावाहिक की स्क्रिप्ट तैयार की थी I जोश, जिगर, फिराक़, मजाज़, मखदूम और हसरत मोहानी की यह कहकशां शानदार थी I इनमे से कुछ शायरों का जिक्र उनकी पुस्तक ‘लखनऊ की
पाँच रातें’ में भी मिलता है I बहरहाल 'कहकशां' अली सरदार जाफ़री से पहला परिचय था I बाद में सिसिलेवार जानकारी हुई I १९३३ में वह अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में दाख़िल हुए I वहां मार्क्सवादी विचारधारा से प्रभावित हुए और१९३६ के आते-आते राजनीतिक कारणों से विश्विद्यालय से निष्काषित कर दिए गए I दिल्ली जाकर उनहोंने १९३८ में जाकिर हुसैन कालेज से ग्रैजुएशन हासिल की I बाद के दिनों में लखनऊ विश्विद्यालय से जुड़े Iसन १९४०-४१ में युद्ध के खिलाफ़ लिखे गए तरानों की वजह से बंदी बनाए गए I उनका ये क्रन्तिकारी रुझान और तेवर ‘लखनऊ की पाँच रातों’ में भी देखा जा सकता है I पाँचवी रात सबसे अधिक भारी है I इसमें मजाज़ लखनवी की जन्नत रुखसती का ज़िक्र है Iक़यामत की रात का ज़िक्र करते हुए जाफ़री साहब लिखते हैं कि, “घर वापस न पहुंचना मजाज़ की वर्षों पुरानी आदत थी I उसकी माँ रोज़ रात को बिस्तर के सिरहाने एक मेज़ पर खाना, कैंची सिगरेट की एक डिबिया और अठन्नी रख देती थीं ताकि मजाज़ किसी आलम आये उसे तकलीफ़ न हो Iरिक्शे वाले भी वाकिफ़ थे,और वह अक्सर मजाज़ को घर पहुंचा कर बिस्तर पर लिटा देते, और सिरहाने रखी हुई अठन्नी उठा ले जाते थे I आज की रात ऐसा कुछ न था Iपलंग के पास बैठी बूढी माँ उसका इंतज़ार कर रही थी Iबरसों का खोया बेटा घर वापस आ गया था, हमेशा के लिए” I ये दिसम्बर ०५,१९५५ की बात है Iजाफ़री बताते हैं की जिस जमाने में मजाज़ पर गम,तकलीफ और उदासी के बादल छा जाते थे ,तब भी उनकी शायरी शिगुफ्ता रहती थी Iवह अपने गमों की नुमाइश नहीं करते थे न ही अपने दुःख का मातम सबके सामने करते I अपने दुःख के बयाँ में मजाज़ ने इतना ही बयान किया है, “ सबके तो गरीबां सी डाले , अपना ही गरीबां भूल गए I“ उनकी शायरी में जाती गमों की परछाईंयां कम हैं I उनकी नाजुक मिजाजी को इस बात से ही समझा जा सकता हा की जब वह साइंस के तालिबे-इल्म थे मेज पर मेंढक देख क्लास से भाग गए और साइंस की तालीम तर्क कर दी I “मुसाफ़िर भाग वक्ते-बेकसी है तेरे सर पर अजल मंडरा रही है” (मजाज़)
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अली सरदार ज़ाफरी प्रगतिशील आंदोलन से जुड़े रहे।वह स्वंतत्रता सेनानी तो थे ही,आंदोलन की अगुवाई के साथ ही उन्होंने भक्ति आंदोलन पर मौलिक काम किया। उनकी एक चर्चित पुस्तक है, 'लख़नऊ की पाँच रातें'।यह यात्रा वृतांत भी है,संस्मरण भी। इसमें उन्होंने अपने दोस्तों और सफ़र के दौरान मिले जाने-अनजाने लोगों के बारे में तफ़सील से बात की है। सरसता से सराबोर यह किताब अपने मे कुछ दुर्लभ संस्मरण समेटे हुए है।काफ़ी पुरानी है लेकिन आज भी प्रासंगिक है। न पढ़ी हो तो पढ़ कर देखें। राजकमल से (1998)छपी है। आसानी से उपलब्ध है। जोश की आत्मकथा पढ़ते हुए ख़याल आया..
_________नीलिमा
(नोट : यू ट्यूब पर वीडियो भी अपलोड हैं।रुचि हो तो देखें।)
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