किताबें जो पढ़ी गईं : अल्टरनेटिव हिन्दूज़
वेंडी डॉनिगर की अकादमिक जगत में भाषा शास्त्री के रूप में अपनी साख और प्रतिष्ठा है। उनकी पुस्तकें विषयगत मौलिकता के लिए चर्चा पाती रही हैं। 'द हिन्दूज़ :एन आल्टरनेटिव हिस्ट्री' नामक अपनी पुस्तक के लिए उन्होंने हिंदुत्व जैसे विवादित विषय को चुना। उनकी इस पुस्तक को पर्याप्त चर्चा मिली। इतिहासकारों ने कुछ पक्षों के लिए इसकी आलोचना भी की। चर्चा और आलोचना अकादमिक जगत का अभिन्न हिस्सा है। इसे सामान्य प्रतिक्रिया माना जाता है। ख़ास बात ये है कि इस पुस्तक की चर्चा और आलोचना अकादमिक जगत के बनिस्बत पुरातनपंथियों ने अधिक की। वजह थी हिन्दुओं की धार्मिक भावना को ठेस पहुँचना। सन 2009 में प्रकाशन के पश्चात पुस्तक ने इतिहासकारों और आलोचकों का ध्यान आकर्षित किया। जनवरी2010 में 'नेशनल बुक क्रिटिक्स सर्किल' ने 2009 की अपनी अवार्ड लिस्ट में 'द हिन्दूज़' के नाम की घोषणा कर दी। इस घोषणा के साथ ही पुस्तक पर चल रही चर्चा और बहस का रुख बदल गया। 'हिन्दू अमेरिकन फाउंडेशन' ने 'नेशनल बुक क्रिटिक्स सर्किल' द्वारा पुस्तक को अवार्ड देने का विरोध किया। पुस्तक से तमाम संदर्भ और उद्धरण उदधृत कर उसे हिन्दू धर्म की छवि को धूमिल करने वाला बताया गया।हिन्दू अमेरिकन फाउंडेशन ने पुस्तक की विषय वस्तु को यथार्थ से भटका हुआ बताते हुए उस पर हिन्दू धर्म की ख़िलाफ़त का आरोप मढ़ा। प्रोफ़ेसर वेंडी डॉनिगर की इस बात को लेकर निंदा की गई कि उन्होंने पुस्तक में हिंदू धर्म का संकुचित नज़रिए से सतही विश्लेषण किया है। उनमें व्यापकता का अभाव है। इन वजहों को रेखांकित करते हुए 'द हिन्दूज़ को सम्मानित होने वाली पुस्तकों की सूची से बाहर करने की मांग की गई। हिन्दू अमेरिकन फाउंडेशन के द्वारा किया गया यह विरोध ' अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' के दायरे में था। विरोध का अगला चरण 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' पर प्रश्नचिन्ह लगाने वाला और अधिक कुरूप था। भारत में पुस्तक के वितरण के साथ ही 'शिक्षा बचाओ आंदोलन समिति' ने पुस्तक का पुरजोर विरोध करना प्रारंभ किया। तर्क था कि पुस्तक "अपधर्मी पहेलियां बुझाती है" और उसमें दिए गए तथ्य हिन्दू धर्म पर हमला करने वाले, आपत्तिजनक हैं। इस बाबत समिति के अध्यक्ष दीनानाथ बत्रा ने कोर्ट में याचिका दायर कर अपील की,कि पुस्तक के वितरण पर रोक लगे और उसकी प्रतियां प्रकाशक के द्वारा नष्ट कर दी जाएं। कोर्ट का फैसला श्री बत्रा के पक्ष में रहा।प्रकाशक पेंग्विन ने वितरण प्रतिबंधित कर फरवरी 2014 से छः माह के भीतर प्रतियों को नष्ट करने पर सहमति जताई। इस फ़ैसले से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, आलोचना, असहमत अथवा विमत होने की प्रवृत्ति को न सिर्फ गहरी चोट पहुँचाई बल्कि उस पर पाबंदी लगा दी। साथ ही इस बात के लिए भी चौकस कर दिया कि इतिहास का जो पक्ष हिंदुत्व के एजेंडे के अनुरूप नहीं है उसका क्या हश्र हो सकता है। हालांकि इतिहास इस बात का गवाह रहा है कि तथ्यों के अनुसंधान और विमर्श की मानवीय प्रवृत्ति को सीमित समयावधि के लिए दबाया तो जा सकता है परंतु हमेशा के लिए दफ़न नहीं किया जा सकता। वस्तुगत तथ्य को जानने की मानवीय उत्कंठा यदि श्री बत्रा की आकांक्षा के अनुरूप इतनी कमजोर होती तो कॉपरनिकस और गैलीलियो को सज़ा देने के बाद सूर्य अब भी पृथ्वी के चक्कर लगा रहा होता।
__________________नीलिमा
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