किताबें जो पढ़ी गईं : मैंने माण्डू नहीं देखा
'मैंने मांडू नहीं देखा' स्वदेश दीपक की सात साल लम्बी बीमारी के अनुभवों का दस्तावेज़ है। 'मांडू' के संदर्भ से इसे इतिहास से न जोड़ें। दरअसल मांडू एक मेटाफर की तरह इस्तेमाल किया गया है इस शीर्षक में। जो कोई भी इस किताब से गुज़रा होगा उसने इस बात को महसूस भी किया होगा। अनुभवों का ये दस्तावेज़ कुछ मोड़ों पर बेहद उदास करता है। कभी- कभी हैरत में डालता है। यदा-कदा मुस्कान भी तैरती है होठों पर। मुझे ये स्वदेश जी का आत्म- संवाद लगा। हर बात जैसे वो ख़ुद से कह रहे हों और मुतमईन हो जाना चाहते हों कि बात का साझा दूसरों से किया जा सकता है या नहीं। यह किताब उनके बीमार हुए मन की उद्विग्नता का हमसे साझा है जिसकी वजह से उन्हें चिकित्सकीय परामर्श लेना पड़ा। लेकिन इसे किसी मेडिकल जर्नल के लिए लिखा गया पर्चा नहीं माना जाना चाहिए। दरअसल ये स्वदेश दीपक के हौसलों का दस्तावेज़ है। अपनी मानसिक अस्वस्थता की वजह से वह जिस अँधेरी सुरंग में प्रवेश कर गए थे उससे बाहर आने के बाद न सिर्फ़ उन्होंने उसमें पलट कर झाँका, बल्कि उसके ब्यौरे को हम सबके सामने रखने की हिम्मत भी दिखा सके। ये सिर्फ़ उनकी हिम्मत की दाद है जो बार-बार इस किताब को पलटने की इच्छा जगाती है। उनका कोई नाटक अभी तक देखा नहीं है हमनें, पढ़ा भी नहीं है। उनकी प्रसिद्धि के बारे में जरूर पढ़ा है। एक नाटक कार का जीवन ख़ुद प्रहसन बन जाए विडम्बना ही है।हालांकि हम सब भी 'रंगमंच' का ही हिस्सा हैं...
___________नीलिमा
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