बनारस 23
संस्मरण :
वाकया कुछ पुराना है I २०१४-१५ का वक्त था I ट्रेन में सफ़र के दौरान बनारस शहर से लौट रहे सहयात्रियों के बीच बातचीत हो रही थी I बनारस देखने विदेशी भी खूब आते हैं I यात्रियों में एक गोरा भी था जो कुछ दिन बनारस में बिता कर लौट रहा था I उसके चेहरे पर एक भयानक खिन्नता थी I वजह जानने की उत्सुकता में बनारसियों ने उससे बातचीत आगे बढाई I पूछा, कैसी लगी हमारी आध्यात्म की नगरी काशी I बन्दा एकदम से फट पड़ा I "इतनी गंदगी!!! उफ्फ्फ़! हर तरफ़ मल –मूत्र , गोबर बिखरा हुआ था I शिट आल अराउंड ..." अपने बनारसी सहयात्रियों की वक्रोक्ति देखते हुए भी वह पूरे सम्मान के साथ बोला, “मेरा अनादर का कोई इरादा नहीं है I आकर्षण और उत्सुकता ही मुझे सात समुंदर पार से खींच कर यहाँ तक ले आये I हिन्दुस्तानी संस्कृति जानने-बूझने समझने आया था मैं I लेकिन शहर बनारस ने मुझे बेहद निराश किया I सडकें बेहद गन्दी, साड़ हर जगह डेरा जमाए, घाटों पर गंदगी, मल-मूत्र, हडियल दिखते भिखारी गरीबी और विकलांगता का भोंडा प्रदर्शन कर आपको आक्रांत करते, डराते हुए I क्या हिंदुस्तान के लोग यही संस्कृति देश-विदेश में दिखाना चाहते हैं ? क्या यही है जिस पर उन्हें गर्व है ? अगर बनारस इंटरनेशनल मैप पर है तो उसे बेहतर देखने की कोशिश नहीं की जानी चाहिए ? क्या चौतरफा फैली अराजकता-दुर्व्यवस्था को व्यवस्थित नहीं किया जा सकता I” एक सांस में वह इतना कुछ बोल गया I उसकी बात सच और कड़वी थी I सुनने में बुरी भी लगी, नजरें भी झुकीं I अभी उसकी बात खत्म ही हुई थी कि दूर बैठे एक सहयात्री ने लगभग फुफकारते हुए गोरे पर धावा बोला , ‘ज्ञान की नगरी है काशी ,समझने के लिए गहरे पैठना पड़ता हैं ' I इतना कह कर दंभ और उपेक्षा ने नजरें फेर लीं ,जवाब का इंतजार भी न किया I गोरे ने विनम्रता से अपनी बात आगे बढाई, “ मेरा अनुभव बिलकुल अलग रहा I किसी ने मुझसे ज्ञान की कोई बात नहीं की I हर कोई मुझसे दुकानदार की तरह पेश आया I किसी ने मुझसे ये तस्दीक न की कि मुझे क्या चाहिए ? ज्यादातर लोग मुझे कुछ न कुछ बेचना चाहते थे I होटल का कमरा , टूरिस्ट पैकेज सब कुछ था यहाँ तक की मारिजुआना भी I लेकिन किसी ने शहर का इतिहास, उससे जुड़े मिथक-किस्से बताने का प्रस्ताव नहीं रखा I बात करते लोग पान की पीक बराबर हवा में उड़ा रहे थे...’’ एक सहयात्री से यह ‘महिमा बखान’ बिलकुल बर्दाश्त न हो रहा था I उसने पूछ ही लिया, ' काशी विश्वविध्यालय नहीं गए ??' सुनते ही गोरे की आँखें चमक गयीं, बोला “ वाह ! क्या जगह है I सुकून ही सुकून... पूरे शहर से अलहदा है वह जगह Iबस मुझे एक बात की हैरानी हुई कि इतने सुन्दर-शिक्षित लोग अपने शहर की आबोहवा ठीक करने में कोई रूचि क्यों नहीं लेते ?? बनारस घाटों का शहर है I उसे साफ़-सुथरा और बेहतर क्यों नहीं बनाते ??”सहयात्रिओं में से कुछ ने सर हिलाकर उसकी बात पर समर्थन की मोहर लगाई और समवेत स्वर में सरकार को कोसना शुरू कर दिया I रात बढ़ने के साथ उनकी बतकही की आवाजें मद्धिम पड़ती गयीं I नींद ने उन्हें अपनी आगोश में ले लिया I
(ये बतकही रोली जिंदल ने दर्ज़ की है,शब्द मैंने दे दिए।)
तस्वीर:उज्ज्वल सिंह
#नज़रभरबनारस
#neelimapandey22

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