बनारस 21

घाट बनारस- ठाठ बनारस: 04 काशी की लोक प्रचलित मान्यता मुक्ति और मोक्ष से जुड़ी हुई है।मोक्ष की अभिलाषा में काशी को ठौर बनाना काशी वास कहलाया।मानव का स्वभाव है आगत और विगत में झूलते रहना। उसकी ये स्वभावगत विशेषता सम्भवतः प्रकृति प्रदत्त है।आगत से जुड़ी हुई मुक्ति की अभिलाषा में कईयों ने खुद ही अपनी जान ले ली । इसका विकृत रूप हम काशी करवट के रूप में देखते हैं। इसी सिलसिले में हमें कबीर याद आते हैं। पूरे हिंदुस्तान में मुक्तिदायिनी के रूप में विख्यात काशी में अपने जीवन का अधिकांश भाग बिता चुके कबीर ने मरने से क़रीब तीन बरस पहले काशी को ये कहते हुए तज दिया था कि : 'लोका मति के भोरा रे, जो काशी तन तजै कबीरा, तौ रामहि कौन निहोरा रे ' इन अवधारणाओं ने काशी को महाश्मशान की संज्ञा दी। महाश्मशान संबोधन का एक सिरा शिव से भी जुड़ता है। इन मान्यताओं की वजह से बनारस परंपरागत श्राद्ध और अंत्येष्टि संस्कार के महत्वपूर्ण स्थल के रूप में विकसित हुआ। बनारस के मणिकर्णिका घाट इस संस्कार के लिये महत्वपूर्ण माना जाता है। इस घाट पर पूर्वजों का लेखा रजिस्टर (Genology record)बनाने की भी परंपरा रही है। उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद में भी गंगा के घाटों पर पूर्वजों का लेखा व्यवस्थित किया जाता था। इसे आमतौर पर बही कहा गया है। बही रखने की परंपरा सम्भवतः हरिद्वार से शुरू हुई। हरिद्वार अब उत्तराखंड का हिस्सा है। भारत में जिन अन्य जगहों पर यह जिनोलॉजी रिकॉर्ड रखा जाता रहा है उनमें थानेश्वर(कुरुक्षेत्र, हरियाणा),पेहोवा( हरियाणा), ज्वालामुखी(कांगड़ा, हिमाचल),चिन्तपुरनी ग्राम(उना, हिमाचल), त्रयम्बकेश्वर(नासिक,महाराष्ट्र), तारकेश्वर(पश्चिम बंगाल) प्रमुख हैं। बिहार के मैथिली ब्राह्मण और करण कायस्थ भी अपने पूर्वजों का लेखा(Genelogy record) व्यवस्थित करवाते थे। यहाँ बही को 'पंजी' कह कर संबोधित किया गया है और इस व्यवस्था को 'पंजी प्रबंधन' कहा गया है।सम्भवतः ये दोनों शब्द पंजिका से उद्भूत हैं। इसी संदर्भ में यह भी उल्लेखनीय है कि मिथिला के करण कायस्थ सदियों पहले प्रव्रजन के माध्यम से कर्नाटक से आकर मिथिला में बस गए। ये लोग करण,दास,लाल-दास आदि उपनामों का इस्तेमाल करते हैं। घाटों पर पंडों के द्वारा व्यवस्थित किये गए पितरों से जुड़े ये हस्तलिखित आलेख वंश वृक्ष के निर्धारण में, खोये हुए परिवार को ढूंढने में, उत्तराधिकार के मामले सुलटाने में, सम्पति के झगड़े निबटने में सहायक हुए हैं।1947 के विभाजन के बाद तितर-बितर हुई आबादी की पहचान ढूंढने में भी इनकी भूमिका रही है।बही लेखे से जुड़े हुए परिवार इनको पवित्र और प्रमाणिक मानते हैं। उनकी विश्वसनीयता पर संदेह नहीं करते। #नज़रभरबनारस #Banaras ________________नीलिमा



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