बनारस 14
बनारस के दालमंडी मोहल्ले का नाम जेहन में आते ही कोठा-मुजरा,गाने-बजाने वालियों की परंपरा का परिवेश अतीत के पन्नों से उभरने लगता है। यहाँ हम आज सिर्फ़ जगह के नाम पर चर्चा करेंगे। किसी ख़ास पेशे के साथ उसकी पहचान पर नहीं। जिस जगह को आज दालमंडी के नाम से पहचाना जाता है उसे विगत में 'हकीम मोहम्मद जाफर' मार्ग है के नाम से सम्बोधित किया जाता था। पिछले बरस 2018 में प्रशासन ने इस क्षेत्र को अतिक्रमण मुक्त करवाया। उसी दौरान यह जानकारी सामने आई।
चौक से नई सड़क के बीच जिस गली को लोग दालमंडी के नाम से जानते हैं, उस गली का नाम 'हकीम मोहम्मद जाफर' मार्ग है। इस गली के एक तरफ चहमामा मोहल्ला है और दूसरी ओर रेशम कटरा। बीते बरस जिला प्रशासन ने दालमंडी को अतिक्रमण -मुक्त करने का अभियान चलाया था । अभियान के दौरान चौक थाने के ठीक बगल में गली के नुक्कड़ पर लगा चुनार के पत्थर का एक शिलापट्ट सामने आया। इसे सन 1962 में लगाया गया था। लगने के कुछ दिनों बाद उसके चारो तरफ अतिक्रमण उग आया । शिलापट्ट अतिक्रमण की भीड़ में दब गया और नज़रों से ओझल हो गया। लगभग पाँच दशकों से अधिक समय तक लोगों की नजर की जद से दूर रहा।
बीते बरस अतिक्रमण से आजाद होने पर जब उससे आमना-सामना हुआ तो उत्सुकता वश जाफ़र साहब के बारे में तहकीकात की गई। आसपास बसने वाले लोग ही खोजबीन करने लगे कि आख़िर जाफ़र साहब कौन थे? किस दौर में थे? उनकी क्या खूबियां थीं? लोगों के इस कौतूहल को दालमंडी व्यापार मंडल के प्रवक्ता शकील जादूगर जी ने शांत किया।
हकीम मोहम्मद जाफ़र का जन्म वर्ष 1840 ईसवी में बनारस के पितरकुंडा मोहल्ले में हुआ था और वर्ष 1923 के आते-आते उनका इंतकाल हो गया। वह यूनानी पद्धति के चिकित्सक थे। उन्हें इस पद्धति से उपचार में महारत हासिल थी। उनकी चौथी पीढ़ी के प्रतिनिधि डॉ. मुश्ताक जाफ़री बताते हैं कि मो. जाफ़र ने 30 साल तक लखनऊ में एक मानिंद हकीम की शागिर्दी की। उसके बाद उन्हें सोने के पानी से लिखी सनद दी गई। वह सनद अब भी सुरक्षित है। बनारस और ग्वालियर के राजघराने उनके मुरीद थे। करीब डेढ़ सौ वर्ष पूर्व ही उन्होंने टीबी और कुष्ठ जैसी बीमारियों की अचूक दवा तैयार की थी। इसके लिए वह समुद्री केकड़े के नीले खून का उपयोग करते थे।
डॉ. मुश्ताक बताते हैं कि, "वर्ष 1962 में बनारस में यूनानी चिकित्सा पद्धति को लेकर एक बड़ा सम्मेलन हुआ था। उस सम्मेलन में पांच राज्यों के स्वास्थ्य मंत्रियों ने हिस्सा लिया था। उसी आयोजन के दौरान पांचों मंत्रियों की मौजूदगी में चौक थाने के बगल में हमारे परदादा के नाम का पत्थर दोबारा लगवाया गया था। एक वैसा ही पत्थर नई सड़क के पास लंगड़े हाफिज मस्जिद के पीछे भी लगाया गया था। उनके नाम से रास्ते का नामकरण आजादी के ठीक बाद हुआ था"।
हकीम जाफ़र के पांच परपोतों में दूसरे नंबर के मुर्तजा जाफ़री ने अपने परदादा की यादों को बड़े सलीके से महफूज रखा है। अपनी पुरानी कोठी के उस हिस्से को आज भी पुराने अंदाज में ही बरकरार रखा है जिसमें हकीम जाफ़र साहब खैराती यूनानी अस्पताल चलाया करते थे।
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तस्वीर: विजय सिंह
_______________नीलिमा

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