बनारस 13
ग़ालिब और बनारस:03
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ग़ालिब की जो तमाम लिखत-पढ़त मिली है उससे पता चलता है की वह उर्दू पर फ़ारसी को तवज्जो देते थे I फ़ारसी उन दिनों अभिजात्यों की भाषा थी I उन्होंने फ़ारसी में ग्यारह मसनवियाँ लिखीं I उनका फ़ारसी दीवान भी उर्दू दीवान से काफी बड़ा है I बनारस पर लिखी गयी चिराग़-ए-दैर उनकी तीसरी मसनवी है I मसनवी उस विशेष काव्य विद्या को कहा जाता जिसमें किसी ख़ास किस्से या वाकये का बयान होता है I इस मसनवी में बनारस क़याम के दौरान मिर्ज़ा के दिली जज़्बात दर्ज़ हैं I बीमारी,तंगहाली और सफ़र की थकान ने ग़ालिब को मायूस कर दिया था I दिल्ली से उन्हें बेइंतहा मोहब्बत थी पर दिल्ली के नाशुकरे व्यवहार से वह आहत थे और नाराज़ भी I दिल्ली से उनकी मोहब्बत और नाराजगी को चिराग-ए-दैर के अशआरों में बखूबी देखा जा सकता है I
बनारस की भी उन्होंने बेइंतहा तारीफ की है I बनारस को जन्नत और फिरदौस का दर्ज़ा देने के साथ ही अपने दोस्त को ख़त लिखते हुए वह कहते हैं की, ‘बनारस का दर्ज़ा इतना बुलंद है की वहां तक किसी इंसान की कल्पना भी नहीं पहुंच सकती’ I वह बनारस को दिल्ली के लिए रश्क का कारण बताते हैं I वह बनारस के रूहानी-रूमानी माहौल से बेहद प्रभावित दीखते हैं I मोहम्मद अली खां को लिखे गए ख़त में उनकी बनारस के प्रति बढ़ती हुई लगावट साफ़ देखी जा सकती है I वह मौलवी को बताते हैं बनारस से उनकी अजनबियत खत्म हो गई है और इस बुतखाने में बजाए जाने वाले शंखों की आवाज उन्हें खुश करती है I बनारस रहते हुए उन्हें अब दिल्ली की याद नहीं सताती है I उनका एक मन यह भी कहता है की वह माथे पर तिलक लगा कर,जनेऊ पहन गंगा के किनारे जा बैठें और तब तक बैठे रहें जब तक कि उनकी जिंदगी भर के गुनाहों की गर्द धुल न जाए और वह पानी के कतरे की तरह दरिया में न मिल जाएँ I लेकिन दुश्मनों के शमातत के खौफ से वह इरादा बदल देते हैं I
एक सौ आठ अशआरों की मसनवी में ग़ालिब बनारस की एक महबूब की तरह तारीफ़ करते हैं I दिल्ली को चिढानें और जलाने वाले अंदाज़ में वह दिल्ली से बेमुर्रव्ती दिखाते हैं Iलेकिन मसनवी के अंत तक आते आते दिल्ली के लिए इस कदर बेचैन हो उठते हैं कि लम्बे समय तक उसकी अनदेखी करने के लिए, अपनों से दूर रहने के लिए,उनसे गफ़लत बरतने के लिए ख़ुद को लानत मलानत भेजने लगते हैं I अपने अशआरों में ग़ालिब ने अपने मनोभावों को बड़ी ही ख़ूबसूरती से पिरोया है I ख़ास बात ये है की ग़ालिब ने बनारस के अपने बयान में जिन्दगी और जिंदादिली को तवज्जो दी है I शहर को वह काशी और बनारस इन्हीं दो नामों से पुकारते हैं I शहर के महाशमशान वाले पक्ष को वह नज़रंदाज़ कर देते हैं Iकाशी में शव या मौत का ज़िक्र वह नहीं करते हैं Iउन्हें आबाद बनारस पसंद है Iउसकी तबाही से उनको गुरेज़ है Iइस बाबत नौ शे’रों में उन्होंने एक दिलचस्प किस्सा पेश किया है जिसके अंत में वह बयान करते हैं की क़यामत बस इसलिए ठहरी हुई है की ईश्वर नहीं चाहता कि ये रंगीन बुनियाद शहर तबाह और बर्बाद हो I
“ परमेश्वर को
ख़ुद नहीं मंज़ूर
कि सृष्टि का
अप्रतिम
यह सुन्दरतम शहर
(काशी)
क़यामत की वजह से
नष्ट और
नाबूद हो जाए I”
तस्वीर: नीलिमा
© neelima

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