भीमबेटका 12
🔹12
हमारे पूर्वजों का रहन-सहन कैसा था इसकी दरियाफ़्त गुफा चित्र कला से की जा सकती है। कब्रों और औजारों के अलावा उनकी जिंदगी के में झांकने की यही एक खिड़की हमारे पास है। पहला सवाल जो जेहन में उठता है वह यह है कि आदिमानव ने यह रेखांकन क्यों किए होंगे। उनके जीवन के किस पक्ष की मुखर अभिव्यक्ति हैं ये? इन्हें धार्मिक अभिव्यक्ति, टोना-टोटका, जादू, अंधविश्वास, अलंकरण जैसे तमाम पक्षों से जोड़ा गया है। संभव है कि यह चित्रकला इन में से किसी एक का प्रतिनिधित्व करती हो बाकी पक्ष गौड़ हों। यह भी संभव है कि यह इन सबका अमलगम हो।
चित्रांकन में से कुछ ऐसे भी हो सकते हैं जिन्हें खेल-खेल में बच्चों ने अपने घर की भीत पर खींच दिया हो या फिर सारे के सारे किसी टोने- टोटम के तहत बनाए गए हों। यह भी संभव है कि प्रागैतिहासिक चित्रकला और उत्कीर्णन भाषायी अभिव्यक्ति हो जिसका अपना स्वयं का व्याकरण और वाक्य विन्यास रहा हो। हम जानते हैं कि मानवीय परिकल्पना और सृजनशीलता की कोई सीमाएं नहीं हैं और पारंपरिक विचारणा कभी भी सरल नहीं रही । हम बस कयास लगा सकते हैं।
हालांकि इसमें कोई दो राय नहीं है कि यह चित्रांकन वक़्त की रेत पर हमारे पूर्वजों के कदमों का निशान हैं। यह उनके सृजन की पहली हलचल है। उनकी विचार प्रक्रिया का पहला दस्तावेज है।
तस्वीर: चित्रांकन यशोधर मठपाल के हैं।
#भीमबेटका
(नोट: भीमबेटका शृंखला समाप्त)
©नीलिमा
©नीलिमा




Comments
Post a Comment