बनारस12
ग़ालिब और बनारस :02
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एक के बाद एक ग़ालिब के वालिद और चचा के इंतकाल के बाद अलवर रियासत से मुक़र्रर होने वाला वजीफा ७५०/- रूपये सालाना की दर से असद उल्लाह खां के नाम से बाँध दिया गया I बाद के दिनों में रियासत के नवाब अहमद बक्श खां ने अपनी जायजाद का बंटवारा कर दिया I ग़ालिब की पेंशन का इलाक़ा नवाब साहब के बड़े बेटे शमसुद्दीन के हिस्से आया I ग़ालिब की शमसुद्दीन के विरोधियों से गाढ़ी छनती थी I वह उनके हिमायती थे I यही बात ग़ालिब के खिलाफ़ चली गयी I इस वजह से शुरुआत में उन्हें पेन्शन देने में हीला-हवाली की गई और बाद में उसे बिलकुल बंद कर दिया गया I क़र्ज़ बढ़ा, तंगहाली बढ़ी I इससे पहले की फांकाकशी की नौबत आये ग़ालिब ने कलकत्ता का रुख किया I बीच रस्ते वह लखनऊ, बांदा, इलाहबाद होते हुए बनारस पहुंचे I परेशानियों ने उन्हें इस कदर हैरान कर दिया था कि उनकी तबियत बिगड़ गई I इस वजह से उन्हें अपनी सफ़र के दौरान तकरीबन पाँच महीने लखनऊ में और आगे छह महीने बांदा में ठहरना पड़ा I बांदा में आराम और इलाज के बाद जब तबियत कुछ संभली तो उन्होनें सफ़र को आगे बढ़ाया और चिल्लातारा पहुंचे I फ़िर समान,घोंड़ों और ख़िदमतगारों का उनका काफ़िला एक कश्ती में सवार हो इलाहाबाद की तरफ़ बढ़ा I किसी वजह से उन्हें इलाहाबाद पहुंचने में तीन के बजाय छह दिन लग गए और ग़ालिब की नासाज़ तबियत फिर से बिगड़ गयी I तबियत की खराबी से पहले से खिन्न ग़ालिब इलाहाबदियों के रूखे व्यवहार से ऐसे बेज़ार हुए की उन्हें इलाहाबाद में एक दिन भी गुजारना नागवार गुजरा और वह गंगा के रास्ते बनारस चल पड़े I पहुंचने पर बनारस की आबोहवा उन्हें ख़ुशगवार लगी I तबियत भी हल्की लगी I बस उन्होनें जगह को मुफीद जान कुछ दिन ठहराना तय किया I ये इरादा करने में ग़ालिब ने पाँच दिन लगाये I ये पाँच दिन उन्होंने नवरंगाबाद की सराय में गुज़ारे I बाद में उसी सराय के पीछे एक बुढ़िया का मकान किराए पर लेकर उसमें रहने लगे I स्थिर होने के बाद उन्होंने अपने दोस्तों,खैरख्वाहों और घर-परिवार के लोगों के साथ चिठ्ठी-पत्री की I एक ख़ास दोस्त राय छजमल खत्री को अपनी खैरियत बताते हुए लिखा –
“लोग कहते हैं वो जा पहुंचा बनारस ज़िन्दा
हमको उस घास के तिनके से ये उम्मीद न थी”
अगले तीन हफ्तों में गालिब का मन बनारस में रम गया और तबियत भी सुधर गयी I बांदा में अपने दोस्त मौलवी मोहम्मद अली खां को अपनी तबियत का हाल लिखते हुए वह अपना दिल खोल कर रख देते हैंI लिखते हैं :
“जब मैं बनारस में दाख़िल हुआ,उस दिन पूरब की तरफ़ से जान बख्शने वाली, जन्नत की सी, हवा चली,जिसने मेरे बदन को तवानाई अता की और दिल में एक नई रूह फूंक दी I उस हवा के करिश्माई असर नेमेरे जिस्म को फतह के झंडे की तरह बुलंद कर दिया Iठंडी हवा की लहरों ने मेरे बदन की कमजोरी दूर कर दी I”
आगे वह शायरी करते हुए बनारस को भरी-पूरी फिरदौस का दर्ज़ा देते हैं I
________________नीलिमा
तस्वीर: देवभूषन

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