बनारस 11
ग़ालिब और बनारस :01
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ग़ालिब उर्दू शायरी का जाना पहचाना नाम हैंI उर्दू शायरी में उन्होंने वह मक़ाम हासिल किया कि न सिर्फ़ अपने वक़्त में बल्कि मौजूदा वक़्त में भी उनकी पहचान अदबी वली की हैI ग़ालिब की पैदाइश आगरा की है जो उस जमाने में अकबराबाद के नाम से जाना जाता था I तारीख: २७ दिसंबर, १७९७ ईस्वी और नाम: असद उल्ला खां I उनके वालिद अब्दुल्ला बेग खां अलवर में राजा बख्तार सिंह के मुलाज़िम थे I उनके दादा कौकान बेग खां तुर्की मूल के थे और शाह आलम के शासन काल(१६४३-१७१२) में हिंदुस्तान तशरीफ़ लाये I ग़ालिब के पिता उनके बचपन में ही लड़ाई के मैदान में खेत रहे I कुछ वक़्त वह अपने चचा की निगहबानी में रहेI लेकिन कुछ रोज बाद ही उनके चचा नस्रउल्ला बेग की हाथी से गिरकर मौत हो गयी I इस वजह से उनका पालन पोषण आगरा में ही उनके ननिहाल में हुआ I तेरह बरस की उम्र में उनका निकाह पढ़वा दिया गया I उनकी बेगम उमराव दिल्ली के लोहारू कुल से ताल्लुकात रखती थीं I ब्याह की तारीख ०९ अगस्त,१८१० दर्ज़ हैI बकौल ग़ालिब उनके वास्ते हुक्में-दवामें-हब्स ( स्थायी कैद का हुक्म) सादिर हुआ और दिल्ली को ज़िन्दान (कैदखाना) मुक़र्रर किया गयाI ब्याह के दो-तीन बरस बाद ग़ालिब आगरा से दिल्ली आ गए और वहीं बस गए Iशायरी की तरफ उनका रुझान शुरुआत से ही था I दिल्ली में उन्हें शायरी का माहौल मिला लेकिन सीरतन शायरों से उनकी कम ही बनी, ज्यादातर ठनी ही रही I उन्हें शायरी का मौजूदा चलन रास न आया I इसके मुताल्लिक़ उनका चर्चित शे’र है, “हैं और भी दुनिया में सुखनवर बहुत अच्छे ; कहते हैं की ग़ालिब का है अंदाज़े बयां और”I यही वजह है कि उन्होंने किसी की शागिर्दी स्वीकार नहीं की और अपने उस्ताद ख़ुद ही बने रहे I उन्होंने ख़ुद की निगह्बानी और खुदमुख्तारी में ही शे’र कहने शुरू किये I उनके भीतर का आलोचक बेहद निर्दयी था जो खुद उन्हें भी नहीं बख्शता था I उनके वही शुरूआती शे’र हमें दीवान–ए–ग़ालिब में दर्ज़ मिलते हैं I अपने इस रवैये के लिए उनकी काफी आलोचना भी हुई I इस बाबत उनका शे‘र है “ न सताइश की तमन्ना न सिले की परवा, गर नहीं हैं मेरे अशआर में माने न सही”I आगरा में ग़ालिब को कोई आर्थिक तंगी न थी I दिल्ली आने पर भी उन्हें सात सौ पचास रुपये की वार्षिक पेंशन बंधी हुई थी I माँ का भी सहयोग था I रियासत अलवर से भी कुछ न कुछ आ जाता था I दिन मजे में गुजर रहे थे I लेकिन यह सूरते-हाल ज्यादा दिन न रही I सन १८२६ से दिन बदलने लगे I सियासी मसलों की वजह से सन १८३१ में उनकी पेंशन पूरी तरह से बंद हो गई I कर्ज बढ़ता गया I तंगी और परेशानी के हाल में ग़ालिब ने गवर्नर जनरल काउन्सिल के सामने अपनी पेंशन- बहाली का मसला रखने के लिए कलकत्ता का सफ़र करना तय किया I यह एक लम्बी दूरी का सफ़र था I इस सफ़र के दौरान लखनऊ, बांदा, इलाहाबाद, बनारस जैसे शहर उनके पड़ाव बनेI बनारस ने ग़ालिब को ऐसा मोहा कि उन्होंने पूरी की पूरी मसनवी ही लिख डाली I
_______________नीलिमा
तस्वीर:आशुतोष शर्मा

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