बनारस07

शहर की नब्ज़ थामनी है, उसे जज्ब करना है या उसमें जज्बात भरना है ; मोहब्बत लिखनी है या इश्क, शरारत या ज़िद; पूरा ताना–बाना इस पर ही निर्भर करता है I शहर की ख़ूबसूरत तसवीरें शाया करना एक बात है और सूरते–हाल से वाकिफ़ होना बिलकुल अलग I हालत पर तफसिरा इन दोनों से जुदा I सुबह की लालिमा और शाम की रौशन रंगीनियों में शहर ख़ूबसूरत ही दीखते हैं चाहे नवाबी लखनऊ हो या कर्मकांडी बनारस I दिन की शफ्फाक रौशनी में उनकी रंगत बदल जाती है, सीरत उभर आती हैI इतिहास और हमारे बीच की दूरी अतीत की रूमानियत को बढ़ा देती है पर वर्तमान की हकीकत बिलकुल अलग होती है I तो बनारस शाया तस्वीरों से बेहद अलग है I ये ढेर सारी समस्याओं से जूझ रहा शहर है I उत्तर प्रदेश के तमाम शहरों का यही हाल है I जिन शहरों में धार्मिक-आर्थिक कारणों से आवाजाही अधिक है ,प्रव्रजन की वजह से जनसंख्या शहर की लम्बाई-चौड़ाई में सिमट नहीं रही है उनकी कसमसाहट अलग हैI शहर में बेहतर नागरिक सुविधाओं की बात तो दूर औसत नागरिक सुविधायें भी नज़र नहीं आती Iलोगों ने असुविधाओं को दिल पर लेना बंद कर दिया है I प्रतिरोध शून्य है I बस जिए जा रहे हैं I चलते-फिरते, उठते-बैठते, एक जुमला कानों से टकराता रहता है , “जिया! राजा बनारस” I मायूसियाँ अपनी जगह प्रजा ने खुद को राजा मान लिया है, कुछ मुस्कुराहटें जबरन अपने खीसे में बाँध लीं हैं। तमाम नाउम्मीदीयों के बीच चुहल से ही सही कुछ पल का सुकून हासिल कर लिया है I कर्मकांड तार्किकता से चाहे कितने ही दूर क्यों न हों अपढ़-अकिंचन अवाम के बीच ज़िन्दा रहने की अटूट चाहत पैदा करते हैं I जिजीविषा से लबरेज करते हैं I इतिहास की खारी बातों, संस्कृति की मीठी चुटकियों,तीखी झिडकियों और वर्तमान की कडुवाहट के बीच हमारी बातें रफ़्ता-रफ़्ता आगे बढ़ेंगी .... ____________________नीलिमा तस्वीर: शरद कबीर © neelima

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