बनारस04
बनारस के ठग :
बनारस के पण्डे यजमान को लूटने के लिए ख्यातिलब्ध हैं I उनकी ठगी के चर्चे दूर-दूर तक फैले हैं I पंडों द्वारा किया गया ये शोषण इतना क्रमिक और चातुर्यपूर्ण होता है कि अगले को जब तक इल्म होता है उसकी जेबें रीत चुकती हैं I उसके पास दो ही रास्ते बचते हैं I या तो वह खुद को गदहा मान ले, ये थोड़ा मुश्किल है I दूसरे ख़ुद से आँखें चुरा कर ‘मूदहूँ आँख कतौ कुछ नाहीं’ वाले अंदाज़ में आगे बढ़ जाए I लेकिन इसमें भी एक किस्म की टीस बनी रहती हैं I ये दोनों स्थितियाँ उसे लम्बे समय तक सालती रहती हैं इसलिए वह बुद्ध से प्रेरणा लेकर मध्यम मार्ग का अनुसरण करता है I दान-धर्म-पुण्य के कठौते में लहालोट होते हुए ख़ुद को संतुष्ट करने के प्रयास में रत हो जाता है I
जहाँ तक पंडों की ठगी और मक्कारी का सवाल है पहली महत्तवपूर्ण बात ये है कि कोई भी लम्बे समय से चली आ रही परम्परा एकरूप नहीं रह सकती I उसमे अच्छाई-बुराई, गुण-ऐब सबका समावेश होगा I दुसरे पंडों की पुरोहिताई उनके अर्थोपार्जन से जुड़ी हुई है I इसलिए उसमे दंद-फंद, छल-कपट, ठगी होना सामान्य है I एक सीमा तक ये बातें धंधे में लाभ की मनोवृत्ति से स्वाभाविक रूप से जुड़ी होती हैं I हाँ! इनका अतिरेक जरूर यजमानों के लिए दमघोटू हो जाता है इससे इनकार नहीं है Iधरम-करम,संस्कार के निमित्त आने वाले यात्रियों को इनकी जरूरत होती है जिससे तीर्थ स्थल पर आने का उनका उद्देश्य पूरा हो सके I
पण्डे इन यात्रियों के स्वनियुक्त पुरोहित होते हैं I कर्मकांड सम्पन्न करवाने, मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करने और स्वर्गारोहण को सरल बनाने की एवज में वह यत्रियों को जम कर ठगते हैं I ठगी के इस कर्म की धुरी पाप-पुण्य, अर्थ–अनर्थ, स्वर्ग-नर्क के इर्दगिर्द घूमती है I इसमें छल-कपट-लालच का भरपूर समावेश होता होता है लेकिन किसी किस्म की छीना-झपटी और हिंसा नहीं होती I इस पूरी प्रक्रिया को खुलेआम चौड़े से पंडा गिरोह अंजाम देता है, वह भी बिना किसी झिझक और आत्मग्लानि के I मृत्योपरांत जीवन की अवधारणा में उलझा और उससे आक्रांत यजमान सिर्फ़ आर्थिक दबाव की वजह से पंडे से खिन्न होता है अन्यथा स्वर्ग में अपनी जगह आरक्षित करवाने से उसे कोई गुरेज नहीं होता I
दिक्कत तब आती है जब पण्डे अपनी लालच में हद दर्जे की धूर्तता पर उतर आते हैं और हिंसक हो उठते हैं I इस बारे में साहित्य से एक महत्वपूर्ण सन्दर्भ मिलता है I काशी-करवट नाम के एक कूएं का जिक्र ठगी के सन्दर्भ में आता है I यह विश्वनाथ मंदिर के पूरब में स्थित है I पंडों ने इस जगह/कूएं को लेकर एक झूठ गढ़ा कि यदि कोई व्यक्ति यहाँ मृत्यु का आलिंगन करता है तो उसे तत्काल मुक्ति मिलती है I मुक्ति मार्ग पर अग्रसर होने से पहले यात्रियों को अपना सबकुछ दान करने के लिए बाध्य किया जाता जिससे उनकी संतान भी पुण्य की भागी बन सकें I
कुछ यात्री इस बहकावे में सहर्ष आ जाते और मृत्यु को गले लगा लेते जो विचलित होते उनको भी मार कर कूएं में फेंक दिया जाता I दोनों ही स्थितियों में मुक्ति का मार्ग हत्या से होकर गुज़रता था I ये पंडों की ठगी का आपराधिक चरम था I इस क्रूर प्रक्रिया के बादशाह अकबर के समय तक जारी रहने की सूचना मिलती है I बाद में क्रमशः शाहजहाँ और औरंगजेब ने हस्तक्षेप कर इस पर पूरी तरह से रोक लगा दी I सन १७४४ ईस्वी में काशी आये अलेक्जेंडर हैमिलटन ने इसका ज़िक्र किया है I मलिक मोहम्मद जायसी(१४६७ -१५४२) ने भी “काशी करवट कूप” का उल्लेख किया हैI इसे आरे वाला कुआं भी कहा जाता था I कुएं के भीतर तामाम आरियाँ जड़ी हुईं थीं जिनपर कूदकर यात्री मुक्ति की अभिलाषा में जान दे देते थे I मरने के बाद का उनका हश्र तो पता नहीं लेकिन पंडे उनको लूटकर जरूर कुछ वक़्त के लिए स्वर्गानन्द भोगते थे I
_____________नीलिमा
तस्वीर: मनोज कर
©neelima

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